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________________ मुनिः जीवन और आपत्काल । ७१ परिणतिके कारण समंतभद्र शरीर से बड़े ही निस्पृह और निर्ममत्व रहते थे— उन्हें भोगों से जरा भी रुचि अथवा प्रीति नहीं थीवे इस शरीर से अपना कुछ पारमार्थिक काम निकालनेके लिये ही उसे थोड़ासा शुद्ध भोजन देते थे और इस बातकी कोई पर्वाह नहीं करते थे कि वह भोजन रूखा-चिकना, ठंडा-गरम, हलका भारी, कडुआ कषायला आदि कैसा है। इस लघु भोजनके बदले में समन्तभद्र अपने शरीर से यथाशक्ति खूब काम लेते थे, घंटों तक कार्योत्सर्ग में स्थित हो जाते थे, आतापनादि योग धारण करते थे, और आध्यात्मिक तपकी वृद्धिके लिये अपनी शक्तिको न छुपाकर, दूसरे भी कितने ही अनशनादि उग्र उग्र बाह्य तपश्चरणोंका अनुष्ठान किया करते थे । इसके सिवाय नित्य ही आपका बहुतसा समय सामायिक, स्तुतिपाठ, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, समाधि, भावना, धर्मोपदेश, ग्रंथरचना और परहितप्रतिपादनादि कितने ही धर्मकार्योंमें खर्च होता था । आप अपने समयको जरा भी धर्मसाधनारहित व्यर्थ नहीं जाने देते थे । इस तरहपर, बड़े ही प्रेमके साथ मुनिधर्मका पालन करते हुए, स्वामी समन्तभद्र जब ' मणुर्वक हल्ली ' ग्राम में धर्मध्यानसहित आनंदपूर्वक अपना मुनिजीवन व्यतीत कर रहे थे और अनेक दुर्द्धर तपश्चरणोंके द्वारा आत्मोन्नतिके पथमें अग्रेसर हो रहे थे तब एकाएक पूर्वसंचित असातावेदनीय कर्मके तीव्र उदयसे आपके शरीर में ' भस्मक ' १ बाह्यं तपः परमदुश्चरमाचरस्व माध्यात्मिकस्य तपसः परिबृंहणार्थम् ॥८३॥ —स्वयंभूस्तोत्र । २ ग्रामका यह नाम ' राजावलीकथे' में दिया है । यह ' कांची ' के आसपासका कोई गाँव जान पड़ता है । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.010669
Book TitleRatnakarandaka Shravakachara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherManikchand Digambar Jain Granthamala Samiti
Publication Year1982
Total Pages456
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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