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________________ MAnwwranAMRAANI AAAAAAAAAAAAAAA *-* *-------- - ४१८ बृहज्जैनवाणीसंग्रह है ॥१३६॥ ता करिके दुःख पाप सहै हो । लोकविर्षे अप कीर्ति लहै हो ॥ नास भयो जसराज तुम्हारो। यो लघु । * सीख सुनो उर धारो ॥१३७॥ अन्य कछू करतव्य विचारो। । तामहँ वांछित सिद्ध तुमारो ।। अर्थ बढ़े धन धर्म बढ़ाई । यो । * दरसावत श्रीगुरु भाई ॥१३८॥ 1 हंतत । हंतत भाषत उत्तम तोही। जो मन वांछहु होवहि सोही ।। मंगल धाम मिल धनधान्यं । जाहु विदेश तहां बहु मान्यं ॥१३९॥ मन्त्र सु जन्त्ररु भेष जताई । सैन्य सुथभन मोहन भाई । अर जिती जगमें वर विद्या । तोहि मिलें। भ्रम त्याग निषिद्या ॥१४०॥ अथ तकारादि चतुर्थ प्रकरण। ___ तन्त्र । जहं तअअ वरन पासा ढरन्त । तहं सुनि पूछक जो फल कहंत ॥ जो करहु देव पूजा पुनीत । तो पैहो अभि1 मत फल विनीत ॥१४१॥ सुत पौत्र सुखद धन धान्य लाहु।। * यह मिले तोहि वांछित उछाहु ॥ व्यापारमांहि बहु मिले। के दर्व । अरु जूत विजय तै लहै सर्व ॥१४२॥ यामें मति चि न्ता मानु मित्त । निज इष्ट देव पद भजउ नित्त ॥ विन पुन्य । नहीं सुख जगत माहि। जिमि वीज विना नहिं तरु लगाहिं॥ । तर । जब तअर प्रगटै होवै सुजान । तव मध्यम फल.. * जानो निदान ॥ चित चाहहु वनिता पुरुष आदि। सो * आस तजहु सुनि भेदवादि ॥१४४॥ निजभावीवश ये मि लहि सर्व । परिवार कुटुम्बादिक सुदर्व ॥ पहले जो कछु ।
SR No.010576
Book TitleVruhhajain Vani Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitvirya Shastri
PublisherSharda Pustakalaya Calcutta
Publication Year1936
Total Pages410
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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