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________________ ܀ सुबोध जैन पाठमाला साधु 'भिक्षु' अवश्य है, पर 'दीन' नही । २६२ ] करके आहार लेना दोष है । -भाग २ ―― श्रत दीनता ६. तिगिच्छे ( चिकित्सा ) चिकित्सा करके आहार आदि लेना । चिकित्सा करने से भी ९ भिक्षुकपन मे कमी आती है २ जीव विराधना सभव है तथा ३. नीरोग न होने पर गृहस्थ को शेष सभव है, अतः यह आहार सदोष है । ७ कोहे (क्रोध) : क्रोध करके गृहस्थ को शाप आदि का भय दिखला कर आहार लेना । ८. मारणे (मान) : मान करके गृहस्थ को अपनी लब्धि आदि दिखला कर, आहार आदि लेना । ६. माया : कपट करके अन्य रूप वेश आदि दिखलाकर आहार आदि लेना । १० लोहे (लोभ) : लोभ करके मर्यादा से अधिक तथा श्रेष्ठ आहार आदि लेना । कषाय करके श्राहार लेने के कारण, ये चारो प्रहार सदोष हैं । ११. पुव्विं पच्छा - संथव ( पूर्व पश्चात् संस्तव) : अधिक प्रहार प्राप्ति के लिए दाता को दान से पहले या पीछे भाट के समान प्रशसा करना । इससे भिक्षुकपन मे कभी श्राने से, यह ग्राहार सदोष है ।
SR No.010547
Book TitleSubodh Jain Pathmala Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorParasmuni
PublisherSthanakvasi Jain Shikshan Shivir Samiti Jodhpur
Publication Year1964
Total Pages311
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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