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________________ २५, ग्रहण २६, न्यवम २७, कल्क २८, कुरुक २९, दंभ ३०, कूट ३१, जैम ३२, किल्बिष ३३, अनादरता ३४, गृहनता ३५, वंचनता ३६, परिकुंचनता, ३७, सातियोग ३८, लोभ ३९, इच्छा ४०, मूर्छा ४१, कांक्षा ४२, गृद्धि ४३, तृष्णा ४४, भिध्या ४५, अभिध्या ४६, कामाशा ४७, भोगाशा ४८, जीविताशा ४९, मरणाशा ५०, नंदी ५१, राग ५२ (१) । ५. गोस्तूभ नामना आवास पर्वतनी पूर्व दिशाना छेल्ला अंतथी वडवामुख नामना महा पातालकलशनी पश्चिम दिशाना छेडा सुधीमां बावन हजार योजननुं अबाधाए आंतरं कर्तुं छे (२)। एज प्रमाणे (दक्षिणमा रहेला) दकभास पर्वतना पूर्व छेडाथी केतुक नामना पातालकळशनु, तथा ( पश्चिममा रहेला ) शंख नामना पर्वतना पूर्वांतथी यूप नामना पातालकलशर्नु, अनेर ( उत्तरमा रहेला ) दकसीम नामना पर्वतना पूर्वांतथी ईश्वर नामना पातालकलशनुं आंतरं बावन वावन हजारचं जाणवू ला . (३) । ज्ञानावरणीय, नाम अने अंतराय ए त्रणे (मूळ ) कमप्रकृतिनी मळीने वावन उत्तरप्रकृतिओ कही छे (४) । सौधर्म, सनत्कुमार अने माहेंद्र ए त्रणे देवलोकना थइने कुल बावन लाख विमानावास (विमानो) कह्या छे (५)॥ टीकार्थ:-हवे बावनमुं स्थान कहे छे-तेमां मोहनीय कर्मना अवयव( विभाग )रूप क्रोधादिक चार कपायोने विषे " अवयवने विषे समुदायनो उपचार थाय छे" ए न्याये करीने मोहनीयनो उपचार करवाथी मोहनीय कर्मना बावन नाम छे एम का छे. तेमां पण सर्वे (चारे) कषायनी अपेक्षाए बावन नाम छे, परंतु एक एक ( दरेक) कपायना नहीं. तेमां क्रोध विगेरे दश नामो क्रोध कषायना छे. तेमां'चंडिके 'नो अर्थ चांडिक्य (चंडपणुं) एवो करवो. तथा मान विगेरे अग्यार नाम मान कषायना छे. तेमां ' अत्तुक्कोसे'-एटले आत्मोत्कर्ष, ' अवक्कोसे '-एटले अपकर्ष, 'उन्नए'-एटले
SR No.010536
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayang Sutra Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJethalal Haribhai
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1939
Total Pages681
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_samvayang
File Size44 MB
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