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________________ श्री समवायाङ्ग सूत्र ॥ चो अंग ॥१४२॥ टीकार्थ:-- हवे सुडतालीशमा स्थानकमां कांइक कहे छे' जया णमित्यादि ' - अहीं एक लाख योजनप्रमाण जंबूद्वीपनी बन्ने बाजुएं एक सो एंशी एक सो एंशी योजन (३६०) बाद करवाथी सर्व आभ्यंतर सूर्यमंडळनो विष्कंभ ९९६४० योजन छे. तेनी परिधि त्रण लाख, पंदर हजार, ने नेवाशी ३१५०८९ थाय छे, आटली परिधिना प्रमाणने सूर्य साठ मुहूर्त्ते ओळंगे हे, तेथी तेने साठे भागाकार करवाथी एक मुहूर्त्तनी गति पांच हजार, बसो ने एकावन योजन तथा एक योजना साठीया ओगणत्रीश भाग ५२५१३३ प्राप्त थाय छे. तथा ज्यारे आभ्यंतर मंडळमां सूर्य चाले छे, त्यारे दिवसनुं प्रमाण अढार मुहूर्त्तनुं होय छे, तेना अर्ध करवाथी नव मुहूर्त्त थाय, ते नववडे एक मुहूर्त्तनी जे गति ( ५२५१३ ) आवी छे तेने गुणवा, तेम करवाथी जे चक्षुस्पर्शनुं प्रमाण ( ४७२६३३१ ) कह्युं छे ते प्राप्त थाय छे (१) । अग्गिनूइ त्ति '- अग्निभूति महावीरस्वामीना बीजा गणधर, तेनो अहीं सुडताळीश वर्षनो गृहवास कह्यो छे, अने आवश्यकमां तो जे छैताळीश वर्षनो कह्यो छे, ते सुडताळीश वर्ष संपूर्ण नहीं होवाथी तेनी विवक्षा करी नथी, अने अहीं असंपूर्णने पूर्ण कहेवानी इच्छाथी कहेल छे, एम संभवे छे, तेथी विरोध नथी (२) ॥ सूत्र- ४७ ॥ हवे अडताळीशमं स्थान कहे छे मू० - एगमेगस्स णं रन्नो चाउरंतचक्कवहिस्स अडयालीसं पट्टणसहस्सा पन्नत्ता । १ । धम्म• स णं अरहओ अडयालीसं गणा अडयालीसं गणहरा होत्था । २ । सूरमंडले णं अडयालीसं समवाय ४८ ॥ ॥१४२॥
SR No.010536
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayang Sutra Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJethalal Haribhai
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1939
Total Pages681
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_samvayang
File Size44 MB
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