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( ५१ ) जीत इत्यादि कहके पुकारते हुये और राजा ऊपर महलोंमें सुनता हुआ परन्तु राजाने मन में कुशौन (बुरा नहीं) माना कि देखो मेरे बेटे को कैसे खोटे वचनकहके रोवे है अपितु राजा जानता है कि नामसे क्या है जिस गुण और क्रिया शरीरसे संयुक्त मेरे बेटेका नाम है वह यह नहीं ताते नाम तो गुणाकर्षणही होता है सो भाव निक्षेपमें ही है ॥ ... (७) पूर्व पक्षी भलाजी पोथीमें जो अक्षर लिखे होते हैं यह भी तो अक्षरों की स्थापनाही है इनको देखके जैसे ज्ञानकी प्राप्तिहोती है। ऐसे ही मूर्तिको देखके भी ज्ञान प्राप्त होता है
उत्तर पक्षी यह तुम्हारा कथन बड़ी भूलका है क्योंकि पोथीके अक्षरोंको देखके ज्ञान कभी नहीं होता है यदि अक्षरोंको देखके ज्ञान होता