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( ४८ ) धारी साधु को नमस्कार नहीं करनी (चेला) क्यों (गुरु) संयम के गुण नहीं (चेला) तो मूर्ति में भी गुण नहीं उसे भी नमस्कार न चाहिये (गुरुजी) मूर्ति में गुण नहीं है तोऔगुण भी तो नहीं है अर्थात् भेषवारी में संयम का गुण तो है नहीं परंतु रागद्वेषादि औगुणहें इस से वंदनीय नहीं,और मूर्ति में गुण नहीं हैं तो रागद्वेषादि ओगुण भी तो नहीं है इससे वंदनीय है, चेला चुप।
उत्तरपक्षी-चेला मूर्ख होगा जो चुपकररही नहीं तो यूं कहता कि गुरु जी जिस वस्तुमें गुण औगुण दोनों ही नहीं वह वस्तु ही क्या हुई वह तो अवस्तु सिद्ध हुई ताते वंदना करना कदापि योग्य नहीं।
इसीकारण गुणानुकूल' नाम मानना सो