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अर्थ-पार्बतीदेवी जी वह है जिन के मन को बालक वस्था से लेकर वृद्धावस्था तक हर किसी ने शान्त रसमय मालूम किया है और जिन के मुख से जेन मतोपदेश के सिवाय शिष्यों ने भी आजतक कभी दूसरा शब्द नही सुना। वसता लवपर मध्ये छात्रान् शास्त्रं प्रवेशयता॥ संमति रत्र सुविहिता दुर्गादत्तेन सुविलोक्य। पं०दुर्गादत्त शास्त्री अध्यापक औ०का०
लाहौर। I have seen the book entitled “Satayartha Chandrodaya Jain" written by Srimatı Sattee Parbatiji. It is against murtipujan, and the authoress proves by quotations from the Jain Sutras that murtipujar ia not dictated in the said Sutras The book is in a very good style and the arguments are well arranged which show that the writer has done justice to the subject according to the Jain scriptures
P TULSI RAM, BA, 8th May 1905.
LAHORE.