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( ८४ ) उत्तरपक्षी-इसका जो अर्थ है सो कर दिखाते हैं परंतु क्या इस ही पाठ से तुम्हारा पर्वत फुड़ाना खानखुदाना पंजावा लगाना मंदिर मूर्ति बनवाना पूजा करानादिक सर्वारंभ जिनाज्ञा में सिद्ध होजायेगा कदापि नहीं लो यथार्थ सुनो (णणत्थ) इतना विशेष अर्थात् इन केसिवाय और किसीको नमस्कार नहीं करूंगा किनके सिवाय (अरिहंतेवा) अरिहंत जी को (अरिहंत चइयाणिवा) पूर्वोक्त अरिहंत देवजी की आज्ञानुकूल संयम को पालनेवाले चैत्यालय अर्थात् चैत्यनाम ज्ञान आलयनाम घर ज्ञानका घर अर्थात् ज्ञानी (ज्ञानवान् साधु)गण धरादिकोंको वंदना करूंगा अर्थात् देवगुरु को देवपद में अरिहंत सिद्ध,गुरुपदमें आचार्य उपा ध्याय मुनि इत्यर्थः और यह पीताम्बरी मूर्ति