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________________ तेरहवां बोल प्रत्याख्यान कायोत्सर्ग करने में आत्मा सुखपूर्वक विचरता है और प्रत्याख्यान करने के योग्य बनता है। प्रत्याख्यान वही कर सकता है जो कायोत्सर्ग करता है । अतएव अब प्रत्याख्यान के विषय मे भगवान से प्रश्न किया जाता है: मूलपाठ प्रश्न-पच्चक्खाणणं भते ! जीवे कि जणयई ? उत्तर - पच्चक्खाणणं पासवदाराई निरु भई, पच्चक्खाणणं इच्छानिरोहं जणयह, इच्छानिरोहं गए ण जीवे सव्वदव्वेसु विणीयतण्हे सीईभूए विहरई ॥१३॥ शब्दार्थ प्रश्न- भगवन् । प्रत्याख्यान करने से जीव को क्या लाभ होता है ? उत्तर-- प्रत्याख्यान करने से ( अर्थात् मूलगुण और उत्तरगुण धारण करने से ) हिंसा आदि आस्रवद्वार बन्द हो जाते है और इच्छा का निरोध हो जाता है । इच्छा का निरोध होने से जीव सब द्रव्यो की तृष्णा से रहित होता है और इस प्रकार शान्तचित्त हो सुखपूर्वक विचरता है ।
SR No.010463
Book TitleSamyaktva Parakram 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Acharya, Shobhachad Bharilla
PublisherJawahar Sahitya Samiti Bhinasar
Publication Year1972
Total Pages307
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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