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________________ महावीर : मेरी पूर्ण समपित व्यक्ति किसी एक के प्रति समर्पित नहीं होता। वह किसी एक के बागे सिर नहीं झुकाता, इसलिए नहीं कि अहंकार है, बल्कि इसलिए कि उसका सिर भुका ही हुआ है सब मोर। अब वह कैसे अलग-अलग खोजने बाए कि इसके प्रति झुको, उसके प्रति न झुको। उसके किसी एक के प्रति झुकने का सवाल ही नहीं, बोर ध्यान रहे जो व्यक्ति किसी एक के प्रति झुकता है, वह दूसरे के प्रति सदा अकड़ा रहता है। और जो व्यक्ति किसी एक के चरण छूता है, वह किसी से चरण छुपाने को आतुर है। में एक बड़े संन्यासी के बाश्रम में पवा। बड़े मंच पर संन्यासी बैठे हुए है। उनके मंच के नीचे एक छोटा तखत है, उस पर एक दूसरे संन्यासी बैठे हैं। उस तस्तके नोचे बोर संन्यासी बैठे हुए है। उस बड़े संन्यासी ने मुझसे कहा किबाप देखते है मेरे बगल में कौन बैठा है ? मैंने कहा मुझे देखने को बकरत नहीं। कोई बैठा है जरूर। उन्होंने कहा, शायद पापको पता नहीं। वह हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस है, साधारण बावमी नहीं है। मेकिन बड़े विनम्र है, कमी मेरे साथ वक्त पर नहीं बैठते हैं। मैंने कहा कि वह मुझे दिखाई पड़ रहा है। लेकिन उनसे भी नीचे तख्त पर कुछ लोग बैठे हुए है। और वे बापके मरखे की प्रतीक्षा कर रहे है कि जब माप मरो तो वे इस तस्त पर बैठें, मोर आपोषो कहा कि यह बारमी विनम्र है क्योंकि बापके साथ नहीं बैठता तो यह भी सोचना जरूरी है कि आप कैसे मादमो हैं। आप बड़े अहंकारी बादमी मालूम होते है । बाप कैसे बादमी है जो कोई आपके साथ बैठे तो माप अविनय समझते है, नीचे बैठे तो बिनब समझते है। लेकिन वे को घेले नोचे बैठे हैं प्रतीक्षा करते है कि वे कब गुरु हो जाएं। जो है किसी के प्रति समर्पित व्यक्ति, वे दूसरों के समर्पण की मांग करते है क्योंकि जो वे इधर देते है, वह दूसरे से मांग करते हैं । निरन्तर मापने देखा होगा कि जो आदमी किसी की बधामद करेगा वह अपने से पीछे वाले लोगों से खुशामद मांगेगा। जो आदमी 'किसी की खुशामद नहीं करेगा वह खुशामद भी नहीं मांगेगा। दोनों बातें एक साथ चलती है। जो बादमी नम्रता दिखलाएगा वह दूसरों से नम्रता की मांग करेगा। महावीर को समझना इस वर्ष में कठिन हो जाता है । म वह किसी के प्रति समर्पित है, न कोई उनका गुरु है, न किसी के परण छूते है, न वे किसी के चरणों में बैठते हैं, नवे किसी के पीछे चलते हैं। तो उन्हें समझना कठिन हो गाणहै। लेकिन मेरी अपनी दृष्टि में यह है कि वह इतने समर्पित व्यकि है, समस्त के प्रति और इस भांति झुके हुए है कि बब और किसके लिए मुकना
SR No.010413
Book TitleMahavira Meri Drushti me
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherJivan Jagruti Andolan Prakashan Mumbai
Publication Year1917
Total Pages671
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size40 MB
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