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________________ ३७२ महावीर : मेरी दृष्टि में हो जाए, किसी पर नाराज हो जाए तो कभी आग में हाथ जले, कभी न जले। कभी प्रह्लाद जैसे भक्त आग में न जलें क्योंकि भगवान् उन पर प्रसन्न है। तो महावीर कहते हैं कि अगर ऐसा कोई नियन्ता है तो नियम सदा गड़बड़ होगा क्योंकि वह जो नियन्ता है वह एक व्यर्थ की परेशानी खड़ी करता है। अब प्रह्लाद उसका भक्त है तो वह उसको जलाता नहीं। पहाड़ से गिराओ तो उसके पैर नहीं टूटते । और दूसरे किसी को गिराओ तो उसके पैर टूट जाते हैं। तो फिर पक्षपात शुरू होगा। प्रह्लाद की कथा पक्षपात की कथा है। उसमें अपने आदमी की फिक्र को जा रही है। उसमें अपने व्यक्ति के लिए विशेष सुविधाएँ और अपवाद दिए जा रहे हैं। महावीर कहते हैं कि अगर ऐसे अपवाद हैं तो फिर धर्म नहीं हो सकता। धर्म का बहुत गहरे से गहरा मतलब होता है नियम । और कोई मतलब नहीं होता। और नियम के ऊपर अपर कोई नियन्ता भी है तो फिर सब गड़बड़ हो जाएगी। कभी ऐसा हो सकता है कि क्षय के कीटाणु किसी दवा से मरें। और कभी ऐसा हो सकता है कि क्षय के कीटाणु भी प्रह्लाद की तरह भगवान् के भक्त हों और दवा कोई काम न करे । इसमें क्या कठिनाई है। फिर नियम नहीं हो सकता। अगर नियम है तो नियन्ता में बाधा पड़ेगी। इसलिए महावीर नियम के पक्ष में नियन्ताको विवा करते हैं। यह बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है नियम के पक्ष में नियन्ता को विदा करने की। वे कहते हैं नियम काफी है और नियम अखण्ड है। नियम से, प्रार्थना, पूजा, पाठ से बचने का कोई उपाय नहीं है। नियम से बचने का एक ही उपाय है कि नियम को समझ लो कि आग में हाथ डालने से हाथ जलता है, इसलिए हाथ मत डालो। इसको समझ लेना जरूरी है। अगर नियन्ता है तो फिर यह भी हो सकता है कि नियन्ता को राजी कर लो फिर हाथ डालो। क्योंकि नियन्ता उपाय कर देगा कि तुम न जलो ! 'अच्छा ठहरो', आग को कह देगा : 'रुको अभी ! इस आदमी को जलाना मत ।' महावीर कहते हैं कि चार्वाक को अगर मान लिया जाए तो भी जीवन अव्यवस्थित हो जाता है क्योंकि वह कहता है कि दो वर्गों के बीच कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। महावीर कहते हैं कि अगर नियन्ता के मानने वालों को मान लिया जाए तो वे भी यह कहते हैं कि अनिवार्य सम्बन्ध के बीच में एक व्यक्ति है जो अनिवार्य सम्बन्धों को शिषिल भी कर सकता है। इसलिए वह कहते हैं कि चार्वाक भी अव्यवस्था में ले जाता है, नियन्ता को मानने वाला भी अव्यवस्था में ले जाता है । यह दोनों एक ही तरह के लोग हैं। चार्वाक नियम को तोड़कर
SR No.010413
Book TitleMahavira Meri Drushti me
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherJivan Jagruti Andolan Prakashan Mumbai
Publication Year1917
Total Pages671
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size40 MB
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