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________________ गा० १६१ ] चारित्रमोहक्षपक-अश्वकर्णकरणक्रिया-निरूपण ७९३ चरिमाए अपुव्यफद्दयवग्गणाए विसेसहीणं देदि । ५१९. तदो चरिमादो अपुयफद्दयवग्गणादो पहमस्स पुव्वफद्दयस्स आदिवग्गणाए असंखेज्जगुणहीणं देदि । तदो विदियाए पुचफद्दयवग्गणाए विसेसहीणं देदि । सेसासु सव्वासु पुवफद्दयवग्गणासु विसेसहीणं देदि । ५२०. तम्हि चेव पडमसमए जं दिस्सदि पदेसग्गं तमपुव्वफयाणं पहमाए वग्गणाए बहुरं । पुत्रफद्दयआदिवग्गणाए विसेसहीणं । ५२१. जहा लोहस्स, तहा मायाए माणस्स कोहस्स च । ५२२. उदयपरूवणा । ५२३. जहा । ५२४ पहमसमए चेव अपुव्वफद्दयाणि उदिण्णाणि च अणुदिण्णाणि च । अपुन्चफयाणं पि आदीदो अणंतभागो उदिण्णो च अणुदिपणो च । उवरि अणंता भागा अणुदिण्णा । उस अन्तिम अपूर्वस्पर्धक-वर्गणासे प्रथम पूर्वस्पर्धककी आदि वर्गणामे असंख्यातगुणित हीन प्रदेशाग्र देता है, उससे द्वितीय पूर्वस्पर्धक-वर्गणाओमे विशेप हीन देता है। इस प्रकार शेष सब पूर्वस्पर्धक-वर्गणाओमें उत्तरोत्तर विशेष हीन देता है। उस ही प्रथम समयमे जो प्रदेशान दिखता है, वह अपूर्वस्पर्धकोकी प्रथम वर्गणामे बहुत और पूर्वस्पर्धकोकी आदि वर्गणामें विशेष हीन है। पूर्व और अपूर्वस्पर्धकोमे दिये जानेवाले प्रदेशाग्रकी यह प्ररूपणा जैसी संज्वलन लोभकी की गई है, उसी प्रकारसे संज्वलन माया, मान और क्रोधकी भी जानना चाहिए ॥५१८-५२१॥ चूर्णिस०-अब उसी अश्वकर्णकरणकालके प्रथम समयमे चारो संज्वलन कषायोके अनुभागोदयकी प्ररूपणा की जाती है। वह इस प्रकार है-प्रथम समयमे ही अपूर्वस्पर्धक उदीर्ण भी पाये जाते हैं और अनुदीर्ण भी पाये जाते है । इसी प्रकार पूर्वस्पर्धकोका भी आदिसे लेकर अनन्तवॉ भाग उदीर्ण और अनुदीर्ण पाया जाता है। तथा उपरिम अनन्त बहुभाग अनुदीण रहता है ॥५२२-५२४॥ विशेषार्थ-इस चूर्णिसूत्रके द्वारा यह विशेप बात सूचित की गई है कि अश्वकर्णकरणके प्रथम समयमे लतासमान-अनन्तिम भाग प्रतिवद्ध पूर्वस्पर्धकरूपसे और उससे अधस्तन सर्व अपूर्वस्पर्धकस्वरूपसे संज्वलन कषायोके अनुभागकी उदय-प्रवृत्ति होती है, इससे उपरिम स्पर्धकोकी उदयरूपसे प्रवृत्ति नहीं होती है । इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है कि अपूर्वस्पर्धकस्वरूपसे तत्काल ही परिणमित होनेवाले अनुभागसत्त्वसे प्रदेशाग्रके असंख्यातवें भागका अपकर्षण करके उदीरणा करनेवाले जीवके उदयस्थितिके भीतर सभीका अपूर्वस्पर्धकोके स्वरूपसे अनुभागसत्त्व पाया जाता है । इस प्रकार पाये जानेवाले सभी अपूर्वस्पर्धक उदीर्ण कहे जाते है। किन्तु सभी अनुभागसत्त्व तो अपूर्वस्पर्धक-स्वरूपसे उदयमे आया नहीं है, अतः उनकी अपेक्षा वे अनुदीर्ण भी पाये जाते है। यही वात पूर्वस्पर्धकोके विपयमे भी जानना चाहिए। अव उसी अश्वकर्णकरणके प्रथम समयमे चारो संज्वलनोका अनुभागवन्ध किस प्रकार होता है, यह बतलाते है १००
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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