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________________ ७०८ कसाय पाहुड सुत्त [ १४ चारित्रमोह-उपशामनाधिकार ति वि सव्वकरणोवसामणा' त्तिवि । ३०३. देसकरणोवसामणाए दुवे णामाणिदेसकरणोवसामणाति वि अप्पसत्य- उवसामणा त्तिवि । ३०४. एसा कम्मपयडीसु । २०५ जा सा सव्वकरणोवसामणा तिस्से वि दवे णामाणि सव्वकरणोत्रसामणा चि विपसत्यकरणोवसामणा विवि । ३०६. एदाए एत्य पयदं । सर्वकरणोपशामना | देशकरणीपशामना के दो नाम है- देशकरगोपशामना और अमणस्तोपशामना । यह देशकरणोपशामना कम्मपयटी (कर्मप्रकृतिप्राभृत) नामक ग्रन्थ में विस्तार से वर्णन की गई है । जो सर्वकरणोपशामना है, उसके भी दो नाम हैं- सर्वकरणोपशामना और प्रशस्तकरणोपशामना । ग्रहॉपर इस सर्वकरणोपशामनामे ही प्रयोजन है । ( इस प्रकार यह 'उपशामना कितने प्रकार की है। इस प्रथम पदकी विभाषा समाप्त हुई । ) ॥ २९७ - ३०६ ॥ विशेषार्थ - उदय, उदीरणा आदि परिणामोंके चिना कर्मों के उपज्ञान्तरूपसे अवस्थानको उपशामना कहते हैं। उसके करण और अकरणके भेदसे दो भेद हैं । प्रशस्त और अप्रस्त परिणाम द्वारा कर्मप्रदेशका उपशान्तभावमे रहना करणोपशामना है । अथवा करणीकी उपशामनाको करोपशामना कहते हैं । अर्थात निधत्ति, निकाचित आदि आठ करणोका प्रशस्त-उपशामनाके द्वारा उपशान्त करनेको करणोपशामना कहते हैं। इससे भिन्न लक्षण वाली अकरणोपशामना होती है । अर्थात् प्रशस्त अप्रशस्त परिणाम के विना ही अप्राप्तकालवाले कर्म- प्रदेशका रूप परिणामके विना अवस्थित करनेको अकरणोपशामना कहते हैं। इमीका दूसरा नाम अनुदीर्णोपशामना है । इसका स्पष्टीकरण यह है कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावका आश्रय लेकर कर्मोंके होनेवाले विपाक-परिणामको उदय कहते हैं । इस प्रकार के उदयसे परिणत कर्मको 'उदीर्ण' कहते हैं । इस उदीर्ण दगासे भिन्न अर्थात् उदयावस्थाको नहीं प्राप्त हुए कर्मको 'अनुदीर्ण' कहते हैं । इस प्रकारके अनुदीर्ण कर्मकी उपशामनाको अनुदीर्णोपशामना कहते हैं । इस अनुदीर्णोपशामनामे करण - परिणामोकी अपेक्षा नहीं होती है, इसलिए इसे अकरणोपशामना भी कहते हैं । इस अकरणोपशामनाका विस्तृत वर्णन कर्मप्रवाद नामक आठवें पूर्वमे किया गया है । करणोपशामनाके भी दो भेद हैं- देशकरणोपशामना और सर्वकरणोपशामना । अप्रशस्तोपशामनादि करणोके द्वारा कर्मप्रदेशोके एक देश उपशान्त करनेको देश करणोपशामना कहते हैं । कुछ आचार्य इसका ऐसा भी अर्थ करते हैं कि दर्शनमोहनीयकर्मके उपशमित हो जानेपर अप्रशस्तोपशामना, निधत्ति, निकाचित, बन्धन, उत्कर्षण, उदीरणा और उदय ये सात करण उपशान्त हो जाते हैं, तथा अपकर्षण और परप्रकृतिसंक्रमण I १ सव्वेसि करणाणमुवसामणा सव्वकरणोवसामणा । जयघ ० २ ससारपाओग्ग- अप्पसत्यपरिणामणिव घणत्तादो एसा अप्पसत्थोवसामणा त्ति भण्णदे । जयध० ३ कम्मपयडीओ णाम विदिय पुन्य पचमवत्थुपविद्धो चउत्थो पाहुडसण्णिदो अहियारो अस्थि, तत्येसा देसकरणोवसामणा दट्ठव्वा, सवित्थरमेदिस्से तत्थ पवंघेण परुविदत्तादो । कथमेत्थ एगस्स कम्मपयडिपा हुडस्स 'कम्मपयडीसु'त्ति बहुवयणणिद्देसो त्तिणासकणिज; एक्कस्स वि तस्स दि वेदणादि-भवंतरा हियारभेदावेक्खाए बहुवयणणिद्दे साविरोहादो | जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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