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________________ . गा० १२३ ] चारित्रमोह-उपशामक-विशेषक्रिया निरूपण ७०१ २३३. जं पदेसग्गं मायाए संकमदि तं विसेसहीणाए सेडीए संकमदि । २३४. एसा परूवणा मायाए पढमसमग-उवसामगस्स । २३५. एत्तो डिदिखंडयसहस्साणि बहूणि गदाणि । तदो मायाए पढमहिदीए तिसु आवलियासु समयूणासु सेसासु दुविहा माया मायासंजलणे ण संछुहदि, लोहसंजलणे च संछुहदि । २३६. पडिआवलियाए सेसाए आगाल-पडिआगालो वोच्छिण्णो । २३७. समयाहियाए आवलियाए सेसाए मायाए चरिमसमय-उवसामगो मोत्तण दो आवलियबंधे समयूणे । २३८. ताधे माया-लोभसंजलणाणं हि दिबंधो मासो। २३९. सेसाण कल्माणं हिदिवंधो संखेज्जाणि वस्साणि । २४०. तदो से काले मायासंजलणस्स बंधोदया वोच्छिण्णा । २४१. मायासंजलणस्स पढमहिदीए समयूणा आवलिया सेसा त्थिवुकसंकमेण लोभे विपच्चिहिदि । . २४२. ताधे चेव लोभसंजलणमोकड्डियूण लोभस्स पहमढिदि करेदि । २४३. एत्तो पाए जा लोभवेदगद्धा होदि, तिस्से लोभवेदगद्धाए वे-त्तिभागा एत्तियमेत्ती लोभस्स पडमहिदी कदा । २४४. ताधे लोभसंजलणस्स द्विदिबंधो मासो अंतोमुहुत्तेण ऊणो । २४५ सेसाणं कम्माणं हिदिबंधो संखज्जाणि वस्साणि २४६. तदो संखेज्जेहि करता है, वह विशेष हीन श्रेणीके द्वारा संक्रमण करता है । यह प्ररूपणा मायाकपायके प्रथमसमयवर्ती उपशामककी है। इसके पश्चात् अनेक सहस्र स्थितिकांडक व्यतीत होते हैं। तब मायासंज्वलनकी प्रथमस्थितिमे एक समय कम तीन आवलियोके शेष रह जानेपर दो प्रकारकी मायाको संज्वलनमायामे संक्रान्त नहीं करता है, किन्तु संज्वलनलोभमें संक्रान्त करता है। यहाँ पर भी प्रत्यावलीके शेष रह जानेपर आगाल और प्रत्यागाल 'व्युच्छिन्न हो जाते हैं ॥२३२-२३६॥ - चूर्णिसू०-एक समय अधिक आंवलीके शेष रहनेपर, एक समय कम दो आवलीप्रमाण नवकबद्ध समयप्रबद्धोको छोड़कर शेप तीनो प्रकारकी मायाका चरमसमयवर्ती उपशामक होता है। उस समय संज्वलनमाया और लोभका स्थितिबन्ध एक मास है। शेष कोंका स्थितिबन्ध संख्यात वर्ष है। तदनन्तर समयमे संज्वलनमायाके बन्ध और उदय व्युच्छिन्न हो जाते है । संज्वलनमायाकी प्रथमस्थितिमे जो एक समय कम एक आवली शेष रही है, वह स्तिबुकसंक्रमणके द्वारा संज्वलनलोभमें विपाकको प्राप्त होगी ॥२३७-२४१॥ चूर्णिमु०-उसी समय संज्वलनलोभका अपकर्षण कर लोभकी प्रथम स्थितिको करता है, अर्थात् उसका वेदन करता है। इस स्थलपर जो लोभका वेदककाल है, उस लोभवेदक-कालके दो त्रिभाग ( 3 ) प्रमाण लोभकी प्रथमस्थिति की जाती है। अर्थात् लोभकी प्रथमस्थितिका प्रमाण लोभवेदककालके दो-बटे तीन भाग है। उस समय संज्वलनलोभका स्थितिवन्ध एक अन्तर्मुहूर्त कम एक मास है। शेष कर्मोंका स्थितिवन्ध संख्यात वर्ष है। तत्पश्चात् संख्यात सहस्र स्थितिवन्धोके बीतनेपर उस लोभकी प्रथमस्थितिका अर्ध भाग
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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