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________________ गा० ११४] दर्शनमोहनीयक्षपक-विशेषक्रिया-निरूपण ६५३ असंखेज्जगुणहीणं । तदो विसेसहीणं। सेसासु वि विसेसहीणं। ७७. विदियसमए जमुक्कीरदि पदेसग्गं तं पि एदेणेव कमेण दिज्जदि । एवं ताव, जाब डिदिखंडयउक्कीरणद्धाए दुचरिमसमयो त्ति । ७८. ठिदिखंडयस्त चरिमसमये ओकड्डमाणो उदये पदेसग्गं थोवं देदि, से काले असंखेन्जगुणं देदि, एवं जाव गुणसेडिसीसयं ताव असंखेज्जगुणं । ७९ गुणगारो वि दुचरिमाए हिदीए पदेसग्गादो चरिमाए ठिदीए पदेमग्गस्स असंखेज्जाणि पलिदोवमवग्गमूलाणि । ८० चरिमे हिदिखंडए णिट्ठिदे कदकरणिज्जो त्ति भण्णदे । ८१. ताधे मरणं पि होन्जन। ८२. लेस्सापरिणामं पि परिणामेज्ज । ८३. काउ-तेउ-पम्म-सुक्कलेस्साणमण्णदरो । ८४. उदीरणा पुण संकिलिट्ठस्सदु वा विसुज्झदु वा तो वि असंखेज्जसमयपबद्धा असंखेजगुणाए सेडीए जाव समयाहिया आवलिया न प्राप्त हो जाय । उससे उपरिम-अनन्तर स्थितिमे असंख्यातगुणित हीन प्रदेशाग्रको देता है और उससे ऊपर विशेप हीन प्रदेशाग्रको देता है । इसी प्रकार शेष भी स्थितियोमे विशेष हीन प्रदेशाग्रको देता है। द्वितीय समयमे जिस प्रदेशाग्रको उत्कीर्ण करता है, उसे भी इस ही क्रमसे देता है । इस प्रकार यह क्रम तब तक जारी रहता है, जब तक कि स्थितिकांडकके उत्कीरण-कालका द्विचरम समय प्राप्त होता है । स्थितिकांडकके अन्तिम समयमे अपकर्षण किये गये द्रव्यमेंसे उदयमें अल्प प्रदेशाग्रको देता है और उसके अनन्तर-कालमें असंख्यातगुणित प्रदेशाग्रको देता है । इस प्रकार गुणोणी-शीर्ष प्राप्त होने तक असंख्यातगुणित प्रदेशाग्रको देता है । द्विचरम स्थिति के प्रदेशाग्रसे चरिम स्थितिके प्रदेशाग्रका गुणकार भी पल्योपमके असंख्यात प्रथम वर्गमूलप्रमाण है । अन्तिम स्थितिकांडकके समाप्त होने पर वह 'कृतकृत्य वेदक' कहलाता है ॥७४-८०॥ विशेषार्थ-सम्यक्त्वप्रकृतिका अन्तिम स्थितिकांडक समाप्त होनेके समयसे लेकर जब तक सम्यक्त्वप्रकृतिको अन्तर्मुहूर्त-प्रमाण गुणश्रेणी-गोपुच्छाएँ क्रमसे गलाता है, तब तक उसकी 'कृतकृत्य वेदक' यह संज्ञा है, अर्थात् इसने दर्शनमोहनीयके क्षपण-सम्बन्धी सर्व कार्य कर लिए हैं, अब कोई काम करना उसे अवशिष्ट नहीं रहा है। चूर्णिस०-उस समय अर्थात् कृतकृत्यवेदक-कालके भीतर उसका मरण भी हो सकता है और लेश्या-परिणाम भी परिवर्तित हो सकता है, अर्थात् कणेत, तेज, पद्म और शुक्ललेश्यामेसे कोई एक लेश्यारूप परिणाम हो सकता है। वह कृतकृत्यवेदकसम्यग्दृष्टि जीव भले ही संक्लेशको प्राप्त हो, अथवा विशुद्धिको प्राप्त हो, तो भी उसके असंख्यातगुणश्रेणीके द्वारा जब तक एक समय अधिक आवलीकाल शेष रहता है, तबतक वरावर असं * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'होज' पदसे आगे 'तद्धाए पढससमयप्पहडि जाव चरिमसमयो त्ति' इतना अश और भी सूत्ररूपसे मुद्रित है ( देखो पृ० १७६६)। पर यह टीकाका अश है, जिसमें कि 'ताधे' पदका अर्थ ही स्पष्ट किया गया है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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