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________________ फसाय पाहुड लुत्त [७ उपयोग अर्थाधिकार १३१. एक्कम्मि णेरइयभवग्गहणे कोहोवजोगा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा । १३२. माणोवजोगा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा । १३३. एवं सेसाणं पि । १३४. एवं सेसासु वि गदीसु । १३५. णित्यगदीए जम्हि कोहोवजोगा संखेजा, तम्हि माणोवजोगा णियमा संखेज्जा । १३६ एवं माया-लोभोवजोगा । १३७. जम्हि माणोवजोगा संखेज्जा, तम्हि कोहोवजोगा संखेज्जा वा असंखेज्जा वा । १३८. मायोवजोगा लोहोवजोगा णियमा आधार करके उस भवग्रणमें एक एक कषायके कितने उपयोग होते हैं, क्या उपयोगोके संख्यात वार होते हैं, अथवा असंख्यात ? इस प्रकारकी पृच्छा इस गाथासूत्रसे की गई है। __ अव चूर्णिकार उक्त पृच्छाका उत्तर देते हैं चूर्णिसू०-एक नारकीके भवग्रहणमे क्रोधकपायसम्बन्धी उपयोगके वार संख्यात भी होते हैं और असंख्यात भी होते है ॥१३१॥ विशेपार्थ-दस हजार वर्पको आदि लेकर यथायोग्य संख्यात वर्षकी आयुवाले नारफीके भवमे क्रोधकपायके उपयोग-वार संख्यात पाये जाते है। इससे ऊपर उत्कृष्ट संख्यात वर्षवाले अथवा असंख्यात वर्पवाले भवमे क्रोधकपायके उपयोग-वार असंख्यात ही होते हैं । इसी व्यवस्थाको ध्यानमे रखकर सूत्रमे कहा गया है कि एक नारकीके भवग्रहणमें क्रोधकपायके उपयोग-बार संख्यात भी होते हैं और असंख्यात भी होते हैं । चूर्णिसू०-नारकीके एक भवमे मानकपायके उपयोग-वार संख्यात भी होते हैं और असंख्यात भी। इसी प्रकारसे नरकगतिमें शेष माया और लोभकषाय सम्बन्धी उपयोगोके वार भी जानना चाहिए । इसी प्रकार शेप गतियोमे भी चारो कपायोके उपयोग-बारोको जानना चाहिए ॥१३२-१३४॥ चूर्णिस०-नरकगतिके जिस भवग्रहणमे क्रोधकपायके उपयोग वार संख्यात होते हैं, उस भवग्रहणमे मानकपायके उपयोग-वार नियमसे संख्यात ही होते हैं । इसी प्रकारसे माया और लोभकपाय-सम्बन्धी उपयोग-वार भी जानना चाहिए । नरकगतिके जिस भवग्रहणमें मानकपायके उपयोग-बार संख्यात होते है, उस भवग्रहणमे क्रोधकपायके उपयोग-वार संख्यात भी होते हैं और असंख्यात भी होते हैं ॥१३५-१३७॥ विशेपार्थ-इसका कारण यह है कि उत्कृष्ट संख्यातमात्र मानकपायके उपयोग-वार होनेपर उससे विशेष अविक क्रोधकपायके उपयोग-वार असंख्यात ही होगे । किन्तु उत्कृष्ट संख्यातसे नीचे यथासम्भव संख्यात-प्रमाण मानकपायके उपयोग-वार होनेपर तो क्रोधकपायके उपयोग-वार संख्यात ही होगे। चूर्णिमू०-नरकगतिके जिस भवग्रहणमें मानकपायके उपयोग-वार संख्यात होते हैं, उस भवग्रहणमें मायाकपायके उपयोग-वार और लोभकपायके उपयोग-वार नियमसे संख्यात ही होते हैं । नरकगतिके जिस भवग्रहणमे मायाकयायके उपयोग-वार संख्यात होते हैं, उस
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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