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________________ गा० ६९] कषाय-परिवर्तन-वार-निरूपण ५७१ परिवत्तदि । ११३. मायापरिवत्तेहिं संखेज्जेहिं गदेहिं सई लोहो परिवत्तदि । ११४. देवगदीए लोभो माया लोभो माया त्ति वारसहस्साणि गंदूण तदो सईमाणो परिवत्तदि । ११५. माणस्स संखेज्जेसु आगरिसेसु गदेसु तदो सईकोधो परिवत्तदि। अवस्थित-परिपाटी-क्रमसे सहस्रो परिवर्तन-वारोंके हो जानेपर तत्पश्चात् एक वार मायाकषायरूप उपयोग होता है। इसका कारण यह है कि अत्यन्त द्वेष-प्रचुर नारकियोंमे क्रोध और मानकषाय ही प्रचुरतासे पाये जाते हैं। चूर्णिसू०-संख्यात सहस्र मायाकषायसम्बन्धी उपयोग-परिवर्तनोके व्यतीत हो जानेपर तत्पश्चात् एक वार लोभकषायरूप उपयोग परिवर्तित होता है ॥११३॥ विशेषार्थ-ऊपर बतलाई गई नरकगति-सम्बन्धी अवस्थित परिपाटी मसे क्रोध और मानसम्बन्धी सहस्रों उपयोग-परिवर्तनोके हो जानेपर एक वार मायापरिवर्तन होता है। पुनः इस प्रकारके सहलो मायापरिवर्तनोके व्यतीत हो जानेपर एक वार लोभकषाय-सम्बन्धी उपयोगका परिवर्तन होता है । इसका कारण यह है कि अत्यन्त पाप-बहुल नरकगतिमें प्रेयस्वरूप लोभपरिणामका होना अत्यन्त दुर्लभ है । इस प्रकारका यह क्रम नारकी जीवोंके अपनी आयुके अन्तिम समय तक होता रहता है। चूर्णिसू०-देवगतिमे लोभ, माया, पुनः लोभ और माया इस क्रमसे सहस्रो परि- . वर्तन-वारोके व्यतीत हो जानेपर तत्पश्चात् एक वार मानकषाय-सम्बन्धी उपयोगका परिवर्तन होता है ।।११४॥ विशेषार्थ-देवगतिमें नरकगतिसे विपरीत क्रम है। यहॉपर पहले लोभकषायरूप उपयोग होगा, पुनः मायाकषायरूप । पुनः लोभ और पुनः माया। इस अवस्थित परिपाटीक्रमसे इन दोनो कषाय-सम्बन्धी सहस्रों उपयोग-परिवर्तनोके हो जानेपर तत्पश्चात् एक वार मानकषाय परिवर्तित होती है। इसका कारण यह है कि देवगतिमें प्रेयस्वरूप लोभ और मायापरिणाम ही बहुलतासे पाये जाते हैं । अतएव लोभ और माया-सम्बन्धी संख्यात सहस्र परिवर्तन-वारोंके हो जानेपर पुनः लोभकषायरूप उपयोगसे परिणत होकर क्रम-प्राप्त माया कषायरूप उपयोगका उल्लंघन कर एक वार मानकपायरूप परिवर्तनसे परिणत होता है । चूर्णिस०-मानकषायके उपयोग-सम्बन्धी संख्यात सहस्र परिवर्तन-वारोंके व्यतीत हो जानेपर तत्पश्चात् एक वार क्रोधकषायरूप उपयोग परिवर्तित होता है ॥११५॥ विशेषार्थ-देवगति-सम्बन्धी कपायोके अवस्थित उपयोग परिपाटी-क्रमसे सहस्रों मानपरिवर्तन-बारोके व्यतीत हो जानेपर एक वार क्रोधकषायरूप उपयोग परिवर्तित होता १ किं कारण ?णेरइएसु अच्चतदोसबहुलेसु कोह-माणाणं चेय पउर सभवादो। २ कुदो एव चेव ? णिरयगदीए अच्चतपापबहुलाए पेजसरूवलोहपरिणामस्स सुटठु दुल्लहत्तादो । जयध० ३ कुदो एव, पेजसरूवाण लोभ-मायाण तत्थ बहुल सभवदंसणादो। जयघ० ४ देवगदीए अप्पसत्ययरकोहपरिणामस्स पाएण सभवाणुवलभादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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