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________________ ४५६ . कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार ६२३. वड्डीए तिणि अणियोगद्दाराणि समुक्त्तिणा सामित्तमप्पावहुअं च । ६२४. समुक्त्तिणा । ६२५. मिच्छत्तस्स अस्थि असंखेज्जभागवड्डि-हाणी असंखेज्जगुणवड्डि-हाणी, अवठ्ठाणमवत्तव्ययं च । ६२६. एवं बारसकसाय-भय-दुगुंछाणं । ६२७. एवं सम्मामिच्छत्तस्स वि, णवरि अवहाणं णत्थि । ६२८. सम्मत्तस्स असंखेज्जभागहाणी असंखेज्जगुणवड्डि-हाणी अवत्तव्ययं च अस्थि । ६२९. तिसंजलण-पुरिसवेदाणमत्थि चत्तारि वढी चत्तारि हाणीओ अवट्ठाणमवत्तव्वयं च । ६३०. लोहसंजलणस्स अत्थि असंखेज्जभागवड्डी हाणी अवठ्ठाणमवत्तत्रयं च । ६३१. इत्थि-णवुसयवेद-हस्सरइ-अरइ-सोगाणमस्थि दो वड्डी हाणीओ अवत्तव्वयं च । ६३२. सामित्ते अप्पाबहुए च विहासिदे वड्डी समत्ता भवदि । ६३३. एत्तो हाणाणि । ६३४. पदेससंकमट्ठाणाणं परूवणा अप्पाबहुअं च । ६३५. परूवणा जहा । ६३६. मिच्छत्तस्स अभवसिद्धियपाओग्गेण जहण्णएण कम्मेण जहण्णयं संकयहाणं । चूर्णिसू०-प्रदेशसंक्रमणसम्बन्धी वृद्धिके तीन अनुयोगद्वार हैं-समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पबहुत्व । उनमेसे पहले समुत्कीर्तना कहते हैं-मिथ्यात्वकी असंख्यातभागवृद्धि होती है, असंख्यातभागहानि होती है, असंख्यातगुणवृद्धि होती है, असंख्यातगुणहानि होती है, अवस्थान होता है और अवक्तव्य होता है। इसीप्रकार अनन्तानुबन्धी आदि बारह कपायोकी तथा भय और जुगुप्साकी जानना चाहिए । इसीप्रकार सम्यग्मिथ्यात्वकी भी वृद्धि-हानि जानना चाहिए। केवल उसका अवस्थान नही होता है ॥६२३-६२७।। चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिकी असंख्यातभागहानि, असंख्यातगुणवृद्धि , असंख्यातगुणहानि और अवक्तव्य होते हैं। संज्वलनक्रोध, मान, माया और पुरुषवेदकी चारों प्रकारकी वृद्धि, चारों प्रकारकी हानि, अवस्थान और अवक्तव्य होता है। संज्वलनलोभकी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातभागहानि, अवस्थान और अवक्तव्यसंक्रमण होता है । स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति और शोककी असंख्यातभागवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि ये दो वृद्धियॉ, असंख्यारामागहानि, असंख्यातगुणहानि ये दो हानियाँ और अवक्तव्यसंक्रमण होता है ॥६२८-६३१॥ चूर्णिसू०-समुत्कीर्तनाके अनुसार स्वामित्व और अल्पवहुत्वकी विभाषा करनेपर वृद्धिसम्बन्धी प्ररूपणा समाप्त हो जाती है ॥६३२॥ इस प्रकार वृद्धि अनुयोगद्वार समाप्त हुआ । चूर्णिसू०-अब इससे आगे प्रदेशसंक्रमणसम्बन्धी स्थानोको कहते हैं । प्रदेशसंक्रमणस्थानोके विषयमे प्ररूपणा और अल्पवहुत्व ये दो अनुयोगद्वार होते हैं। उनमे प्ररूपणा इस प्रकार है-अभव्यसिद्धि कोके योग्य जघन्य कर्मके द्वारा मिथ्यात्वका जघन्य संक्रमस्थान होता है ॥६३३-६३६॥ १त कथ; एदेण (अभवसिद्धियपाओग्गेण) जहष्णकम्मेणागतूण असणिपचिदिएसुववजिय पनत्तयदा होदूण तस्य देवा उअ वधिय सव्वलहुं काल कादूण देवेसुवजिय छहिं पजत्तीहि पजत्तयदो हादृण पढा
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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