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________________ ४४२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार ४८८. अणंताणुबंधीणं भुजगार-अप्पदर-अवविदसंकामयंतरं णत्थि । ४८९. अवत्तव्यसंकामयाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि १४९०. जहणणेण एयसमओ। ४९१. उकस्सेण चउदीसमहोरत्ते सादिरेगे । ४९२. एवं सेसाणं कम्माणं । ४९३. णवरि अवत्तव्यसंकामयाणमुक्कस्सेण वासपुधत्तं । ४९४. पुरिसवेदस्स अवहिदसंकामयंतरं जहण्णेण एयसयओ । ४९५. उक्कस्सेण असंखेजा लोगा। ४९६. अप्पाबहुअं । ४९७. सव्वत्थोवा मिच्छत्तस्स अवट्टिदसंझामयाँ । ४९८ अवत्तव्यसंकामया असंखेज्जगुणा । ४९९. भुजगारसंकामया असंखेज्जगुणा । ५००. अप्पयरसंकामया असंखेज्जगुणा । जीवोकी अपेक्षा अनन्तानुबन्धी कषायोंके भुजाकार, अल्पतर और अवस्थितसंक्रामकोका कभी अन्तर नही होता है ॥४८७-४८८॥ शंका-नाना जीवोंकी अपेक्षा अनन्तानुवन्धी कपायोके अवक्तव्यसंक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ॥४८९॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल सातिरेक चौबीस अहोरात्र है ॥४९०-४९१।। चूर्णिस०--इसीप्रकार शेष कर्मों के भुजाकारादि संक्रामकोका अन्तर जानना चाहिए । केवल शेष कर्मोंके अवक्तव्यसंक्रामकोका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है । पुरुपवेदके अवस्थितसंक्रामकोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है ।।४९२-४९५॥ चूर्णिस०-अब भुजाकारादि संक्रामकोका अल्पबहुत्व कहर है--मिथ्यात्वके अवस्थितसंक्रामक सबसे कम होते है । अवस्थितसंक्रामकोसे अवक्तव्यसंक्रामक असंख्यातगुणित होते हैं। अवक्तव्यसंक्रामकोसे भुजाकारसंक्रामक असंख्यातगुणित होते है। भुजाकारसंक्रामकोसे अल्पतरसंक्रामक असंख्यातगुणित होते हैं ॥४९६-५००॥ १ विसंजोयणादो सजुजतमिच्छाइट्ठीण जहण्णतरत्स तप्पमाणत्तादो । जयध० २ अणताणुबंधिविसजोजयाण व तस्सनोजयाण पि उक्कस्सतरस्स तप्पमाणत्तसिद्धीए विरोहाभावादो। ३ किं कारण; सव्वोवसामणपडिवादुक्कस्सतरस्स तप्पमाणत्तोवलभणादो । जयध ४ कुदो, एगवार पुरिसवेदावट्टिदसकमेण परिणदणाणाजीणाण सुठु बहुअ कालमतरिदाणमसखेजलोगमेत्तकाले वोलीणे णियमा तव्भावसभवोवएसादो । जयध० ५ मिच्छत्तस्सावट्ठिदसकामया णाम पुव्वप्पण्णेण सम्मत्तण मिच्छत्तादो सम्मत्तविपडिवण्णपढमा वलियमिच्छत्तवट्टमाणा उक्कस्सेण सखेजसमयसचिदा ते सव्वत्थोवा, उवरि भणिस्समाणासेसपदेहितो थोव यरा त्ति वुत्त होइ । जयध० । ६ कथ सखेजसमयस चयादो पुबिल्लादो एयसमयसचिदो अवत्तवसकामयरासी असखेजगुणो हाई त्ति णेहासणिज, कुदो, सम्मत्त पडिवजमाणजीवागमसखेजदिभागत्सेवावट्टिदभावेण परिणामन्भुवगमाटो । कुदो एवमवदिपरिणामस्त सुछ दुल्लहत्ताटो । जयध० ७ किं कारण; अंतोमुहुत्तमेत्तकालसचिदत्तादो । जयध० ८ कुदो छावठिसागरोवममेत्तवेदयसम्मत्तकालभतरसचयावलवणाटो । जयध जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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