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________________ गा० ५८] अनुभागसंक्रम-पदनिक्षेप-स्वामित्व-निरूपण ३८३ वड्डी हाणी अवट्ठाणं । जहणिया वड्डी हाणी अवठ्ठाणं । ४१५. णवरि सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणं वड्डी णत्थि'। , ४१६. सामित्तं । ४१७. मिच्छत्तस्स उक्कस्सिया वड्डी कस्स १ ४१८, सण्णिपाओग्गजहण्णएण अणुभागसंकमेण अच्छिदो उक्कस्ससंकिलेसं गदो, तदो उक्कस्सयमणुभागं पबद्धो, तस्स आवलियादीदस्स उक्कस्सिया वड्डी । ४१९. तस्स चेव से काले उक्कस्सयमवट्ठाणं । ४२०. उक्कस्सिया हाणी कस्स १ ४२१. जस्स उकस्सयमणुभागसंतकम्मं तेण उक्स्सयमणुभागखंडयमागाइदं, तम्मि खंडये घादिदे तस्स उक्कस्सिया हाणी'। ४२२ तप्पाओग्गजहण्णाणुभागसंकमादो उक्कस्ससंकिलेसं गंतूण जं बंधदि सो बंधो बहुगो । ४२३. जमणुभागखंडयं गेण्हइ तं विसेसहीणं । ४२४. कर्मोंकी जघन्य वृद्धि होती है, जघन्य हानि होती है और जघन्य अवस्थान होता है। केवल सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वकी वृद्धि नहीं होती है, हानि और अवस्थान होते है ॥४११-४१५॥ चूर्णिसू०-अब स्वामित्वको कहते हैं ॥४१६॥ शंका-मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट अनुभाग वृद्धि किसके होती है ? ॥४१७॥ समाधान-जो जीव संज्ञियोके योग्य जघन्य अनुभागसंक्रमणसे अवस्थित था, वह उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त हुआ और उसने उस संक्लेश-परिणामसे उत्कृष्ट अनुभागवन्धस्थानको बॉधना प्रारम्भ किया। आवलीकालके व्यतीत होनेपर उसके मिथ्यात्वके अनुभागकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है। उस ही जीवके अनन्तर समयमे मिथ्यात्वके अनुभागका उत्कृष्ट अवस्थान होता है ॥४१८-४ १९॥ शंका-मिथ्यात्वके अनुभागकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? ॥४२०॥ समाधान-जिस जीवके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अनुभागसत्त्व था, उसने उत्कृष्ट अनुभागकांडकको घात करनेके लिए ग्रहण किया। उस अनुभागकांडके घात कर दिये जाने पर उस जीवके मिथ्यात्वके अनुभागकी उत्कृष्ट हानि होती है ॥४२१॥ मिथ्यात्वके अनुभागकी यह उत्कृष्ट हानि क्या उत्कृष्ट वृद्धिप्रमाण होती है, अथवा हीनाधिक होती है, इसके निर्णय करनेके लिए आचार्य अल्पबहुत्व कहते है चूर्णिसू०-मिथ्यात्वके योग्य जघन्य अनुभागसंक्रमणसे उत्कृष्ट संक्शको प्राप्त होकर जिस अनुभागको बाँधता है, वह अनुभागबन्ध बहुत है। तथा जिस अनुभाग १ कुदो, तदुभयाणुभागस्स वढिविरुद्धसहावत्तादो । तम्हा जहण्णुक्कस्सहाणि-अवठाणाणि चेव सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमस्थि त्ति सिद्ध । जयध० २ कुदो, तत्थुक्कस्सवड्ढिपमाणेण सकमाणदंसणादो । जयध० ३ कुदो, तत्याणुभागसतकम्मस्साणताण भागाणमसखेजलोगमेत्तछट्ठाणावच्छिण्णाणमेक्वारेण . ४ केत्तियमेत्तेण ? तदणतिमभागमेत्तेण । कुदो, वड्ढिदाणुभागस्स णिरवसेसघादणसत्तीए असभ हाणिदसणादो| जयध० वादो। जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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