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________________ ३४८ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार रिमफद्दयं पि ण उक्कड्डिजदि' । २२. एवमणंताणि फद्दयाणि ओसक्किऊण तं फद्दयमुक्कड्डिज्जदि । २३. सव्वत्थोवो जहण्णओ णिक्खेओं। २४. जहणिया अइच्छावणा अणंतगुणा । २५. उक्कस्सओ णिक्खेवो अणंतगुणो । २६. उक्कस्सओ बंधो विसेसाहिओ । २७. ओकड्डणादो उक्कड्डणादो च जहणिया अइच्छावणा तुल्ला । २८. जहण्णओ णिक्खेवो तुल्लो । २९. एदेण अट्ठपदेण मूलपयडिअणुभागसंकमो । ३०. तत्थ च तेवीसमणिओगदाराणि सण्णा जाव अप्पावहुए ति ( २३)। ३१. भुजगारो पदणिक्खेवो वड्डि त्ति भाणिदव्यो । ३२. तदो उत्तरपयडिअणुभागसंकमं चउवीस-अणियोगद्दारेहि वत्तइस्सामों । जा सकता । इस प्रकार अनन्त स्पर्धक अपसरण करके अर्थात् जघन्य अतिस्थापना और जघन्य निक्षेपप्रमाण स्पर्धकोंको छोड़कर नीचे जो इष्ट स्पर्धक प्राप्त होता है, वह उत्कर्पित किया जाता है और इसके नीचेसे लगाकर जघन्य स्पर्धक-पर्यन्त जितने स्पर्धक हैं, उन सबकी उत्कर्षणा की जा सकती है ॥१९-२२॥ अब उत्कर्पणसंक्रमण-सम्बन्धी जघन्य निक्षेपादि पदोका अल्पबहुत्व कहते हैं चूर्णिसू०-उत्कर्षणसंक्रमण-विषयक जघन्य निक्षेप सबसे कम है । इससे जघन्य अतिस्थापना अनन्तगुणित है। इससे उत्कृष्ट निक्षेप अनन्तगुणित है। उत्कृष्ट निक्षेपसे उत्कृष्ट बन्ध विशेष अधिक है । अपकर्पण और उत्कर्पणकी अपेक्षा जघन्य अतिस्थापना तुल्य है । तथा जघन्य निक्षेप भी तुल्य है.॥२३-२८॥ चूर्णिसू०-इस उपरि-वर्णित अर्थपदके द्वारा मूलप्रकृति-अनुभागसंक्रमणका वर्णन करना चाहिए । उसके विषयमे संज्ञासे लेकर अल्पवहुत्व तक तेईस अनुयोगद्वार होते हैं । केवल एक सन्निकर्प संभव नहीं है। तथा चूलिकारूप भुजाकार पदनिक्षेप और वृद्धि इन तीन अनुयोगद्वारोको भी कहना चाहिए ॥२९-३१॥ चूर्णिव ०-अब उत्तरप्रकृति-अनुभागसंक्रमणको चौवीस अनुयोगद्वारोसे कहेगे ॥३२॥ १ एत्थ कारणमहच्छावणाणिक्खेवाणमसंभवो चेव वत्तव्यो । जयध० २ तत्थाइच्छावणाणिक्खेवाण पडिवुण्णत्तदंसणादो । जयध० ३ किंपमाणो एस जहण्णणिक्खेवो ? एयपदेसगुणहाणिठाणतरफहएहितो अणतगुणमेत्तो। जयध ४ ओकड्डणा जहण्याइच्छावणए समाणपरिमाणत्तादो । जयध० ५ मिच्छाइट्ठिणा उक्कस्साणुमागे वज्झमाणे जपणफदयादिवग्गणुक्कड्डणाए रूवाहियजहण्णा इच्छा वणापरिहीणुक्कस्साणुभागवधमेत्तु ककस्सणिक्खेबुर्टसणादो | जयध० ६ केत्तियमेत्तण ? रूवाहियजहण्णाइच्छावणामेत्तण । जयध० ७ एत्थ मूलपयडिविवक्खाए सणियाससभवाभावादो । जयघ० ८ काणि ताणि चउवीस अणिओगद्दाराणि ? सण्णा सव्वस कमो णोसव्वस कमो उक्कस्ससकमो अणुकस्ससकमो जहण्णसकमो अजहण्णसकमो सादियसंक्रमो अगादियसक्रमो धुवसकमो अदुवसंकमो एगजीवेण सामित्त कालो अंतर सगियासो णाणाजीवेहि भगविचओ भागाभागो परिमाणं खेत्त पोसणं कालो अतर भावो अप्याबहुअं चेदि | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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