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________________ ३३२ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार सादिरेयं । १७९. अप्पयर संकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि १ १८०. जहण्णेणेय - समओ । १८१. उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । १८२. एवं सेसाणं कम्माणं सम्मत-सम्मामिच्छत्तवज्जाणं । १८३. णवरि अणंताणुबंधीणमप्पयरसंकामयं तरं जहण्णेणेयसमओ । १८४. उक्कस्सेण वे छावट्टिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । १८५ सव्वेसिमवत्तव्य संकामयं तरं केवचिरं कालादो होदि १ १८६. जहणेणंतोमुहुत्तं । १८७. उक्कस्सेण अद्धपोग्गल परिय देणं' । १८८. सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार अवद्विदसं कामयं तरं केवचिरं कालादो होदि १ १८९. जहणेणंतो मुहुतं । १९०. अप्पयरसंकामयंतरं जहणेणेयसमयो । १९१. अवत्तव्वसंकामयं तरं जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो । १६२. उक्कस्सेण सव्वेसिमद्धपोग्गलपरिय देसूणं । शंका- मिथ्यात्व के अल्पतरसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? || १७९।। समाधान - मिथ्यात्व के अल्पतरसंक्रमणका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है ।।१८० - १८१ ॥ चूर्णिसू० - इसी प्रकार मिथ्यात्वके समान सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दो को छोड़ कर शेष कर्मोंके संक्रमणका अन्तर जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि अनन्तानुवन्धी कषायोके अल्पतरसंक्रमणका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ अधिक एक सौ वत्तीस सागरोपम है ।। १८२-२८४।। शंका- मिध्यात्वादि तीन कर्मोंको छोड़कर शेष सव कर्मों के अवक्तव्य संक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ।। १८५ ।। समाधान- जघन्य अन्तर काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर काल कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण है ।। १८६-१८७।। शंका- सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकार और अवस्थितसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है १ ।। १८८ ॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मि - ध्यात्वके अल्पतरसंक्रमणका जघन्य अन्तरकाल एक समय है । अवक्तव्य संक्रमणका जघन्य अन्तरकाल पल्योपमका असंख्यातवां भाग है । सबका अर्थात् सम्यक्त्वप्रकृति और १ अणताणुत्रघीण विसजोयणापुव्वसंजोगे सेसक साय- णोकसायाणं च सव्वोवसामणापडिवादे अवत्तव्वसंकमादिं करिय अतरिदस्त पुणो जहष्णुक्कस्सेणतोमुहुत्तद्वयोग्गलपरियमेत्तमतरिय पडिवण्णतभावम्मि तदुभयसभवदसणादो | जयध० २ पुव्युपणसम्मत्तादो परिवडिय मिच्छत्तििदसंतबुड्ढीए सह पुणो वि सम्मत्त पडिवजिय समयाविरोहेण भुजगारमवटि च एगसमय कादूणपदरेणतरिय सव्वलहु मिच्छत्त गतूण तेणेव कमेण पडिणियत्तिय भुजगारावट्ठिदसकामयपजाएण परिणदम्मि तदुबलभादो | जयध० 3 पढमसम्मत्त 'पत्तिविदियसमए अवत्तध्वसंकमत्यादि काढूणतरिदस्स सव्वलहु मिच्छत्त गतूण जहण्णुव्वेल्लणकालम्भतरे तदुभयमुव्वेल्लिय चरिमफालिपदणाणतरसमए सम्मत्त पडिवण्णस्स विदियसमयम्मि तदतर परिसमत्तिदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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