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________________ ३३० कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार तेवद्विसागरोवससदं सादिरेयं । १६२. अवडिदसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? १६३. जहण्णेणेयसमओ । १६४. उक्कस्सेणंतोसु हुत्त । १६५. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार-अवढि द-अवत्तव्य-संकामया केवचिरं कालादो होंति ? १६६. जहण्णुकस्सेणेयसमओ। १६७. अप्पदरसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? १६८. जहण्णेण अंतोशेष रह जाने पर प्रथमसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और अन्तर्मुहूर्त तक अल्पतरसंक्रमण करता रहा । पुनः वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और प्रथम वार छयासठ सागरोपमकाल तक अल्पतरसंक्रमण करके और छयासठ सागरोपमकालमें अन्तर्मुहूर्त शेप रह जाने पर अल्पतरकालके अविरोधसे अन्तर्मुहूर्त के लिए मिथ्यात्वमें जाकर और अन्तरको प्राप्त होकर पुनः सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और दूसरी वार छयासठ सागरोपमकाल तक सम्यक्त्वके साथ परिभ्रमण करके अन्तमे परिणामोके निमित्तसे फिर भी मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ और द्रव्यलिगके माहात्म्यसे इकतीस सागरोपमवाले देवोमे उत्पन्न हुआ। वहाँ पर भी शुक्ललेश्याके माहात्म्यसे सत्कर्मसे नीचे ही स्थितिबन्ध करता हुआ मिथ्यात्वका अल्पतर-संक्रामक ही रहा । वहाँसे च्युत होकर मनुष्योमे उत्पन्न हो करके अन्तर्मुहूर्त तक अल्पतरसंक्रमण कर पुनः भुजाकार या अवस्थित संक्रमणको प्राप्त हुआ । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त और तीन पल्योपमसे अधिक एकसौ तिरेसठ सागरोपम-प्रमाण मिथ्यात्वके अल्पतरसंक्रमणका उत्कृष्टकाल सिद्ध हो जाता है । शंका-मिथ्यात्वके अवस्थितसंक्रमण कितना काल है १ ॥१६२।। समाधान-मिथ्यात्वके अवस्थितसंक्रमणका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ॥१६३-१६४॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकार, अवस्थित और अवक्तव्यसंक्रमणका कितना काल है ' ।।१६५।। समाधान-इनके संक्रमणका जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समय है ॥१६॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके अल्पतरसंक्रमणका कितना काल है ? ॥१६॥ समाधान-इन दोनो प्रकृतियोके अल्पतरसंक्रमणका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और १ कुदो, एयढिदिवधावट्ठाणकालस्स जपणुक्कस्सेणेयसमयमतोमुहुत्तमेत्तपमाणोवलभादो । जयध० २ भुजगारसकमस्स ताव उच्चदे-तप्पाओग्गसम्मत्त-सम्मामिच्छत्तहिदिसतकम्मियमिच्छाइट्ठिणा तत्तो दुसमउत्तरादिमिच्छत्तलिदिसतकम्मिएण सम्मत्ते पडिवण्णे विदियसमयम्मि मुजगारसकमो होदूण तदणतरसमए अप्पदरसकमो जादो । लद्धो जहण्णुक्कस्सेणेगसमयमेत्तो भुजगारसकामयकालो। एवमवदिसंकमस्स वि, णवरि समयुत्तरमिच्छत्तटिठदिसतकम्मिएण वेदगसम्मत्ते पडिवण्णे विदियसमयम्मि तदुवलभी वत्तव्यो । एवमवत्त व्वसंकमस्स वि वत्तव्यं, णवरि णिस्सतकम्मियमिच्छाइटिठणा उवसमसम्मत्ते गहिदे विदियसमयम्मि तदुवलद्धी होदि । जयध० ३ त जहा-एगो मिच्छादिट्ठी पुव्युत्तेहि तीहिं पयारेहिं सम्मत्त वेत्तण विटियसमए मुजगारावठ्ठिदावत्तवाणमण्णदरसकमपजाएण परिणमिय तदियसमए अप्पयरसकामयत्तमुवगओ । जहण्णकाला
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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