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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार वलियमदिकंतो तमुकस्सियट्ठिदिमोक ड्डियूण उद्यावलियबाहिराए विदियाए ठिदीए णिक्खिवदि । वुण से काले उदयावलियबाहिरे अनंतर डिदि पावेहिदि ति तं पदेसग्गमुकड्डियूण समयाहियाए आवलियाए ऊणियाए अग्गट्टिदीए णिक्खिवदि । एस उक्कस्सओ णिक्खेवो' । ४० एवमोकड्डुकडणाणमट्ठपदं समत्तं । ३१८ ४१. एत्तो अढाछेदो । जहा उकस्सियाए द्विदीए उदीरणा तहा उक्कस्स ओ द्विदिकमो' | उत्कृष्ट स्थितिको अपवर्तित कर उदयावलीके वाहिर स्थित द्वितीय स्थितिमे निक्षिप्त करता है । पुनः वह तदनन्तर कालमे ( प्रथम स्थितिको उदयावलीके भीतर प्रविष्ट करके उस द्वितीय स्थितिको ) उदद्यावली के बाहिर अनन्तरस्थिति अर्थात् प्रथम स्थितिके रूपसे प्राप्त करनेवाला था कि परिणामो के वशसे उद्वर्तनाको प्राप्त होकर उस पूर्व अवर्तित प्रदेशाको उद्वर्तित करके एक समय अधिक आवलीसे हीन अग्र स्थिति मे निक्षिप्त करता है । यह उत्कृष्ट निक्षेप है । इस प्रकार समयाधिक आवलीसे अधिक आवाधाकालसे परिहीन उत्कृष्ट कर्मस्थितिका जितना प्रमाण है उतना उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण जानना चाहिए ॥ ३९ ॥ चूर्णिसू० [० - इस प्रकार अपवर्तना और उद्वर्तनाका अर्थपद समाप्त हुआ ||४०|| चूर्णिसू ० ० - अब इससे आगे स्थितिसंक्रम-सम्वन्धी अद्धाच्छेद कहना चाहिए । वह जिस प्रकारसे उत्कृष्ट स्थितिकी उदीरणामे कहा गया है, उसी प्रकार निरवशेष रूप से यहाॅ उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणमे भी जानना चाहिए । अर्थात् उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणकी अद्धाच्छेदप्ररूपणा उत्कृष्ट स्थिति उदीरणाके अद्धाच्छेदके समान है ॥ ४१ ॥ १ जो सणिपचिदियपज्जत्तो सागार-जागार सम्वस किलेसेहि उक्करसदाह गदो उक्कस्सट्रिट्ठदि सत्तरिसागरोवमकोडा कोडिपमाणावच्छिण बंधियूण वधावलियम दिक्कतो तमुक्कस्सिय ट्ठिदिमोकड्डियूणुदयावलियवाहिरपढमठिदिणिसेयादो विसेसहीण विदियठदीए णिसिंचिय तदणतरसमए अनतरवदिक्तसमयपढमट्ठिदिमुदयावलियव्भतर पवेसिय विदियट्ठिदि च पढमट्ठिदित्तेण परिट्ठविय से काले त च णिरुद्धट्ठदिउदयावलियगव्भ पावेहिदि त्ति ठ्ठिदो । तम्मि चेव समए तदणंतरसमयोकड्डिदपटेसग्गमुक्कड्डणावसेण तक्कालियणवकवघपडिवधुक्कस्सट्टिटीए णिक्खिवमाणो पञ्चग्गव धपरमाणूणमभावेणुक्कस्सावाहमेत्तमइच्छाविय तमात्राहावाहिरपढमणिसेयट्ठिदिमादि काढूण ताव णिक्खिवदि जाव समया हियावलिया परिहीणा उक्कत्सकम्मट्ठिदिमेत्त जायदित्ति सुत्तत्थसमासो । जयध० २ अप्पणासुत्तमेदमुकस्सट्ठिदिउदीरणापसिद्धस्स धम्मस्स मूलत्तरपयडिभेय भिष्ण ठिदिसक मुक्कस्तद्वाच्छेदे समप्पणादो | जयघ० वंधाओ उक्कस्सो जालिं गंतूण आलिंगं परओ । उक्कस्स सामिओ संकमेण जासिं दुगं तासि ॥ ३८ ॥ चूर्णि :- जासिं पगडीण वधुकस्सो ठितिसकमो तासिं उकस्सट्रिट्ठदिवधगा एव णेरइय- तिरियमणुच देवा वधावलियाए परतो उक्कोस सकामति । 'सकमेण जासिं दुग तासिं' ति, सकमेण उक्कोसट्ठितिसंकमो जासिं पगतीण तासिं दुआवलियं गंतूण ते चेव णारगादी सामिओ । जहासभव 'दुग' ति. वधावलिय-सकमावलियविहूणो ठितिसंक्रमो । सभ्मत्त सम्मा मिच्छत्ताण उक्कस्तसामी भगति
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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