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________________ २५६ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार ४५. सम्मामिच्छत्तस्स संकामओ को होइ ? ४६. मिच्छाइट्ठी उच्चेल्लमाणओ । ४७. सम्माट्ठी वा णिरासाणो । ४८. मोत्तूण पढमसमयसम्मामिच्छत्तसंतकम्मियं । ४९. दंसणमोहणीयं चरितमोहणीए ण संकमइ । ५०. चरितमोहणीयं पि दंसणमोहणीए ण संकमह । ५१. अणंताणुबंधी जत्तियाओ चज्झति चरित्तमोहणीयपडीओ तासु सव्वासु संकमइ । ५२. एवं सव्वाओ चरितमोहणीयपयडीओ । ५३. ताओ पणुवीसं पि चरित्त मोहणीयपपडीओ अण्णदरस्त संकर्मति । ५४. एयजीवेण कालो । ५५. मिच्छत्तस्स संकामओ केवचिरं कालादो होदि १ ५६. जहणेण अंतोमुहुत्तं । ५७. उकस्सेण छाबडिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ५८. सम्मत्तस्स संकामओ केवचिरं कालादो होदि १५९. जहणेण अंतोमुहुत्तं । ६०. उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो । ६१. सम्मामिच्छत्तस्स संकामओ केवचिरं कालादो होदि १६२. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ६३. उकस्सेण वे छावट्टिसागरोचमाणि गई हो, वह मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्वप्रकृतिका संक्रमण नहीं करता है ॥४३-४४॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वका संक्रामक कौन जीव है ? ॥ ४५ ॥ समाधान - सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करनेवाला मिध्यादृष्टि जीव सम्यग्मिथ्यात्व - का संक्रामक होता है । आसादनासे रहित उपशमसम्यग्दृष्टि जीव भी सम्यग्मिथ्यात्वका संक्रामक होता है । तथा प्रथम समय मे सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्तावाले जीवको छोड़कर सर्व वेदकसम्यग्दृष्टि भी सम्यग्मिथ्यात्व के संक्रामक होते है ||४६-४८।। चूर्णि सू० - दर्शनमोहनीय कर्म चारित्रमोहनीयकर्मसे संक्रमण नहीं करता है । चारित्रमोहनीयकर्म भी दर्शनमोहनीय कर्ममे संक्रमण नहीं करता है । चारित्रमोहनीय कर्म की जितनी प्रकृतियाँ बँधती हैं, उन सबमे अनन्तानुवन्धीका संक्रमण होता है । इसी प्रकार सर्व चारित्र - मोहनीय - प्रकृतियाँ भी अनन्तानुवन्धीमे संक्रमण करती है | चारित्रमोहनीयकी ये पच्चीसो ही प्रकृतियाँ किसी भी एक प्रकृतिमे संक्रमण करती है ।।४६-५३ ।। चूर्णिसू० ० - अब एक जीवकी अपेक्षा संक्रमणका काल कहते है ||५४ || शंका- मिथ्यात्व के संक्रमणका कितना काल है ? ॥ ५५ ॥ · . समाधान - मिथ्यात्व के संक्रमणका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ अधिक छयासठ सागरोपम है ||५६-५७॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति के संक्रमणका कितना काल है ? || ५८|| समाधान-सम्यक्त्वप्रकृतिके संक्रमणका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण है ।।५९-६०॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्व के संक्रमणका कितना काल है ? ॥ ६१ ॥ समाधान- सम्यग्मिथ्यात्व के संक्रमणका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल कुछ अधिक दो वार छयासठ सागरोत्रम है ॥ ६२-६३॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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