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________________ २५४ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रमण अर्थाधिकार पयडिट्ठाणपडिग्गहो पयडिट्ठाण-अपडिग्गहो त्ति एसो णिग्गमो अट्ठविहो । २७. 'एकेकाए संकमो दुविहो संकमविही य पयडीए' त्ति पदस्स अत्थो कायव्यो । २८. 'एकेकाए' त्ति एगेगपयडि संकमो, दुविहो त्ति 'संकमो दुविहो' त्ति भणियं होइ । 'संकमविही य' त्ति पयडिट्ठाणसंकमो । 'पयडीए' त्ति पयडिसंकमो त्ति भणियं होइ । २९. 'संकमपडिग्गहविहि' त्ति संकमे पयडिपडिग्गहो । ३०. 'पडिग्गहो उत्तम-जहणणो' त्ति पयडिहाणपडिग्गहो। ३१. 'पयडि-पयडिहाणेसु संकमो' त्ति पयडिसंकमो पयडिट्ठाणसंकमो च । ३२. 'असंकमो तहा दुविहो' त्ति पयडि-असंकमो पयडिहाण-असंकमो च । ३३. 'दुविहो पडिग्गहविहि' त्ति पयडिपडिग्गहो पयडिट्ठाणपडिग्गहो च । ३४. 'दुविहो स्थान-असंक्रम, (५) प्रकृति-प्रतिग्रह, (६) प्रकृति-अप्रतिग्रह, (७) प्रकृतिस्थान-प्रतिग्रह और ( ८ ) प्रकृतिस्थान-अप्रतिग्रह, इस प्रकार निर्गमके आठ भेद होते हैं । यह प्रथम सूत्रगाथाकी विभाषा है ।।२०-२६॥ चूर्णिसू०-अव दूसरी गाथाके 'एकेकाए संकमो दुविहो संकमविही व पयडीए' इस पूर्वार्धका अर्थ करना चाहिए । वह इस प्रकार है :- 'एक्काए' इस पदका अर्थ 'एकैकप्रकृतिसंक्रम' है। 'दुविहो त्ति' इस पद का अर्थ है कि 'संक्रम दो प्रकारका होता है। 'संकमविही य' इस पदका अर्थ 'प्रकृतिस्थानसंक्रम हैं' और 'पयडीए' इस पदका अर्थ 'प्रकृतिसंक्रम' है । इस प्रकार पूर्वार्धका सीधा अर्थ यह हुआ कि 'प्रकृतिका संक्रम दो प्रकारका होता है-एक-एक प्रकृतिका संक्रम अर्थात् एकैकप्रकृतिसंक्रम और प्रकृतिमे संक्रमविधि अर्थात् प्रकृतिस्थानसंक्रम । 'संक्रमपडिग्गहविहीं' गाथाके इस तृतीय चरणका अर्थ 'संक्रममे प्रकृति-प्रविग्रह' है। 'पडिग्गहो उत्तम-जहण्णो' गाथाके इस चतुर्थ चरणका अर्थ प्रकृतिस्थानप्रतिग्रह है । इस प्रकार समुच्चयरूपसे इस गाथाके द्वारा चार निर्गम सूचित किये गये हैंप्रकृति-संक्रम, प्रकृतिस्थान-संक्रम, प्रकृति-प्रतिग्रह और प्रकृतिस्थान-प्रतिग्रह । यह दूसरी सूत्रगाथाकी विभापा है ॥२७-३०॥ चूर्णिसू०-अव तीसरी गाथाका अर्थ करते हैं-'पयडि-पयडिट्ठाणेसु संकमो' गाथाके इस प्रथम अवयवका अर्थ-प्रकृति-संक्रम और प्रकृतिस्थान-संक्रम है। 'असंकमो तहा दुविहो' गाथाके इस दूसरे पदका अर्थ-असंक्रम दो प्रकारका होता है-प्रकृति-असंक्रम और प्रकृतिस्थान-असंक्रम । 'दुविहो पडिग्गहविही' गाथाके इस तीसरे पदका अर्थ है कि प्रतिग्रहविधि दो प्रकारकी है-प्रकृति-प्रतिग्रह और प्रकृतिस्थान-प्रतिग्रह । 'दुविहो अपडिग्गहविही य' गाथाके इस अन्तिम चरणका अर्थ है कि अप्रतिग्रहविधि भी दो प्रकारकी होती १ परिणमयह जीसे त पगईइ पडिग्गहो एसो'। यत्या प्रकृती आधारभूतायां तत्प्रकृत्यन्तरस्थ दलिक परिणमयति आधारभूतप्रकृतिरूपतामापादयति' एषा प्रकृतिराधारभूता पतद्ग्रह इव पतद्ग्रहः संक्रम्यमाणप्रकृत्याधार इत्यर्थः । कम्मप ० संक्र० ११२
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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