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________________ गा० २२.] - स्थितिक अल्पबहुत्व निरूपण २४५ ८४. जो उवसंतकसाओ सो मदो देवो जादो, तस्स पढमसमयदेवस्त जणयं णिसेय - द्विपित्तयमुदयादिपत्तयं च । ८५. अधाणिसेयट्ठिदिपत्तयं जहण्णयं कस्स १८६. अभवसिद्धियपाओग्गेण जहण्णएण कम्पेण तसेसु उववण्णो, तप्पा ओग्गुकस्सट्टिदि बंधमाणस्स जदेही आवाहा, तावदिमसमए तस्स जणयमधाणि सेट्ठिदिपत्तयं । said काले कम्मट्ठदिअंतो स पि तसो ण आसी । ८७. एवं पुरिसवेद - हस्म -रह-भय- दुगु छाणं । ८८. इत्थि - णवुंसयवेद - अरदिसोगाणमधाणिसेयादो जहण्णयं द्विदिवत्तयं जहा संजलणाणं तहा कायव्वं । ८९. जम्हि अघाणिसेयादो जहणयं द्विदिपत्तयं तहि चैत्र णिसेयादो जहण्णयं द्विदिपत्यं । ९०. उदयडिदिपत्तयं जहां उदयादों झीणडिदियं जहण्णयं तहा णिरवयवं कायव्वं । ९१. अप्पाबहुअं । ९२. सव्वपयडीणं सव्वत्थोवमुक्कस्सयमग्गडिदिपत्तयं । समाधान- जो उपशान्तकषाय- वीतरागछद्मस्थ संयत मरकर देव हुआ, उस प्रथम - समयवर्ती देवके उक्त बारह कषायोका निषेकस्थिति प्राप्त और उदयस्थिति प्राप्त जघन्य प्रदेशाय होता है ॥ ८४ ॥ शंका- अप्रत्याख्यानावरणादि बारह कपायोका यथानिपेकस्थितिप्राप्त जघन्य प्रदेशाय किसके होता है ? ॥ ८५ ॥ समाधान - जो जीव अभव्यसिद्धिकोके योग्य जघन्य सत्कर्मके साथ सो उत्पन्न हुआ । वहॉपर उत्पन्न होनेके प्रथम समयमे ही तत्प्रायोग्य संक्कु शके द्वारा तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट स्थितिको बांधा । इस प्रकार उत्कृष्ट स्थितिको वॉधनेवाले उसके जितनी तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट आबाधा है, उतने समय तक उसके बारह कषायांका जघन्य यथानिपेकस्थितिको प्राप्त प्रदेशाग्र होता है । यह जीव अतीतकाल मे कर्मस्थिति के भीतर एक वार भी सपर्यायमे उत्पन्न नही हुआ है ॥ ८६ ॥ विशेषार्थ - यहॉपर कर्मस्थिति से अभिप्राय पल्योपमके असंख्यातवें भागसे अधिक एकेन्द्रिय जीवोकी कर्मस्थिति से है, क्योकि उससे अधिक कर्मस्थिति के माननेपर प्रकृतमे उसका कोई लाभ नहीं दिखाई देता, ऐसा जयधवलाकारने स्पष्टीकरण किया है । चूर्णिसू० - इसी प्रकार पुरुषवेद, हास्य, रति, भय और जुगुप्साका तीनो ही प्रकार - के स्थितिप्राप्त प्रदेशाोके स्वामित्वको जानना चाहिए । स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, अरति और शोक इन प्रकृतियोके यथानिषेकसे जघन्य स्थितिको प्राप्त प्रदेशाके स्वामित्वकी प्ररूपणा संज्वलन - कषायोके समान करना चाहिए । जिस समयमे यथानिपेककी अपेक्षा जघन्य स्थितिप्राप्त प्रदेशाग्रका स्वामित्व होता है, उसी ही समय में निषेककी अपेक्षासे भी जघन्य स्थितिप्राप्त प्रदेशाग्रका स्वामित्व होता है । उपर्युक्त प्रकृतियो के जघन्य उदयस्थितिप्राप्तककी प्ररूपणा उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाय के समान अविकल रूपसे करना चाहिए ।। ८७-९० ।। चूर्णिसु०-अब उपर्युक्त अग्रस्थितिप्राप्त आदि चारो प्रकार के प्रदेशाप्रोका अल्पबहुत्व
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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