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________________ गा० २२] श्रीण-अक्षीणस्थितिक स्वामित्य निरूपण २२१ झीणद्विदियं कस्स ? ६०. गुणिदकम्मंसिओ सव्वलहुं दंसणमोहणीयं कम्मं खवेदुमाढत्तो अघहिदियं गलतं जाधे उदयावलियं पविस्समाणं पविट्ठ ताधे उक्कम्सयमोकट्ठणादो वि उक्कड्डणादो वि संकमणादो वि झीणद्विदियं । ६१. तस्सेव चरिमसमयअक्खीणदंसणमोहणीयस्स सचमुदयंत मुक्कस्सयमुदयादो झीणहिदियं । ६२. सम्मामिच्छत्तस्स उस्कस्सयमोकड्डणादो उक्कड्डणादो संकमणादो च झीणहिदियं कस्स १ ६३. गुणिदकम्मंसियस्स सबलहुं दसणमोहणीयं खवेमाणस्स सम्मामिच्छत्तरस अपच्छिमद्विदिखंडयं संन्भमाणयं संछुद्ध, उदयावलिया उदयवज्जा भरिदल्लिया, तस्स उकस्सयमोकड्डणादो उक्कड्डणादो संक्रमणादो च झीणहिदियं । ६४. उक्कस्सयमुदयादो झीणट्टि दियं कस्स ? .... समाधान-जिस गुणितकमांशिक जीवने सर्वलघु कालके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका क्षपण करना प्रारम्भ किया, ( और अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण परिणामोके द्वारा अनेक स्थितिकांडक और अनुभागकांडकोका घातकर मिथ्यात्वके द्रव्यको सम्यग्मिथ्यात्वमे संक्रान्त किया । पुनः पल्योपमके असंख्यातवें भागमात्र अन्तिम स्थितिकांडकको चरमफालिस्वरूपसे सम्यक्त्वप्रकृतिमे संक्रान्त किया और सम्यक्त्वप्रकृतिके भी पल्योपमासंख्येयभागी तात्कालिक स्थितिकांडकसे अष्टवर्पप्रमाण स्थितिसत्कर्मको करके और उसमे संक्रान्त करके फिर भी संख्यात सहस्र स्थितिकांडकोके द्वारा सम्यक्त्वप्रकृतिकी स्थितिको अत्यल्प करके जो कृतकृत्यवेदक होकर अवस्थित है, ) उसके अधःस्थितिसे गलता हुआ सम्यक्त्वप्रकृतिका प्रदेशाग्र जिस समय क्रमसे उदयावलीमे प्रवेश करता हुआ निरवशेपरूपये प्रविष्ट हो जाता है, उस समय उक्त जीवके अपकर्पणसे, उत्कर्पणसे और संक्रमणसे सम्यक्त्वप्रकृतिका उत्कृष्ट श्रीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है । उस ही चरमसमयवर्ती अक्षीणदर्शनमोही जीवके जो दर्शनमोहनीयकर्मका सर्वोदयान्त्य प्रदेशाग्र है, वह सम्यक्त्वप्रकृतिका उदयमे उन्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र है ॥ ६०-६१ ॥ विशेपार्थ-सर्व उदयोके अन्तमे उदय होनेवाले कर्म-प्रदेशाग्रको सर्वोदयान्त्य प्रदेशाग्र कहते है। शंका-सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका अपकर्पणसे, उत्कर्पणसे और संक्रमणने उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ? ॥ ६२ ॥ समाधान-जिस गुणितकांशिक जीवने सर्वलत्रु कालसे दर्शनमोहनीयको क्षपण करते हुए सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके संक्रम्यमाण अन्तिम स्थितिकांडकको संक्रान्न कर दिया और उदय-समयको छोडकर उदयावलीको परिपूर्ण कर दिया, उसके सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका अपकर्षणसे, उत्कर्षणसे और संक्रमणसे उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है।॥६॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका उदयमे उत्कृष्ट श्रीणन्थितिक प्रदेशाग्र जिसके होता है ॥ ६४ ॥ १ एत्य सम्बमुढयतमिदि ने सर्वेषामदयानाम निपश्चिममुदयप्रदेाग गदि मान्यमिति
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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