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________________ गा० २२ ] उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति-अल्पबहुत्व-निरूपण २०१ ११६. अप्पाचहुअं । ११७. सव्वत्थोवम पञ्चकखाणमाणे उकस्सपदेससंतकम्पं । ११८. को उकस्सपदेससंत्तक्रम्मं विसेसाहियं । ११९. मायाए उक्कस्सपदेस संत कम्म विसेसाहियं । १२०. लोभे उक्कस्तपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १२१. पचकखाणमाणे उकस्सपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १२२. कोधे उकस्सपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १२३. मायाए उकस्तपदेस संतकरमं विसेसाहियं । १२४, लोभस्स उक्कस्सपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १२५. अनंताणुवंधिमाणे उक्कस्तपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १२६. कोथे उक्कस्सपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १२७ मायाए उक्कस्तपदेस संतकम्पं विसेसाहियं । १२८, लोभे उक्कस्तपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १२९. सम्माच्छित्ते उक्कस्सपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १३०. सम्मत्ते उक्करसपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । १३१. मिच्छत्ते उक्कस्तपदेस संतकम्मं विसे साहियं । १३२. इस्से उक्कस्तपदेस संतकम्ममणंतगुणं । -अप्रत्याख्यानावरण चूर्णि सू० - अब प्रदेशसत्कर्मसम्बन्धी अल्पबहुत्व कहते हैं। मानकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म सबसे कम है । इससे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे अप्रत्याख्यानावरण मायाकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे अप्रत्याख्यानावरण लोभकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है ।।११६-१२०॥ चूर्णि सू० - अप्रत्याख्यानावरण लोभकपायके उत्कृष्ट प्रदेश सत्कर्म से प्रत्याख्यानावरण मानकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे प्रत्याख्यानावरण क्रोधकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे प्रत्याख्यानावरण मायाकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे प्रत्याख्यानावरण लोभकपायमे उत्कृष्ट प्रदेश सत्कर्म विशेष अधिक है ।। १२१ - १२४॥ चूर्णिसू०[० - प्रत्याख्यानावरण लोभकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे अनन्तानुबन्धी माकपा उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे अनन्तानुवन्धी कोवकपाय उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इसमे अनन्तानुबन्धी मायाकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । इससे अनन्तानुबन्धी लोभकपायमे उत्कृष्ट प्रदेश सत्कर्म विशेष अधिक है ।। १२५-१२८ ।। चूर्णिसू० - अनन्तानुवन्धी लोभके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मस सम्यग्मिथ्यात्वमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म सम्यक्त्वकृतिम उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । सम्यक्त्वप्रकृति के उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे मिळवावप्रकृतिभे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । मिध्यात्वप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशने हाम्यप्रकृति उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म अनन्तगुणा है । ।। १२९-१३२॥ २६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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