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________________ गा० २२ ] उत्तरप्रकृति प्रदेशविभक्ति-स्वामित्व-निरूपण १८९ २२. तदो पदेसुत्तरं दुपदेसुत्तरमेवमणताणि द्वाणाणि तम्मि ट्ठिदिविसेसे | २३. केण कारणेण १ २४. जं तं जहाक्खयागदं तदो उक्कस्सयं पि समयपवद्धमेत्तं । २५. जो पुण तहि एक्कन्हि ठिदिविसेसे उकस्सगस्स विसेसो असंखेज्जा समयपवद्धा । २६. तस्स पुण जहण्णयस्स संतकम्मस्स असंखेज्जदिभागो । २७. एदेण कारणेण एवं फद्दयं । २८. दो द्विदिविसेसेसु विदियं फद्दयं । २९ एवमाचलिय समयृणमेत्ताणि फदयाणि । ३०. अपच्छिमस्स डिदिखंडयस्स चरिमसमयजहण्णफदयमादि काढूण जाव मिच्छत्तस्स उक्कस्सगं ति एदमेगं फद्दयं । ३१. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णयं पदेस संतकम्मं कस्स १३२. तधा चैव सुहुमगल जाता है और उदद्यावली में जो गलने योग्य द्रव्य था, वह भी जब गल जाता है, तब जिस समय एक निपेककी दो समय प्रमाण स्थिति अवशिष्ट रहती है, उस समय उस जीवके मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसत्कर्म होता है ।। २०-२१॥ चूर्णिस ० - उस जघन्य प्रदेशस्थानसे एक प्रदेश अर्थात् एक परमाणुसे अधिक दूसरा प्रदेशस्थान होता है, दो प्रदेशसे अधिक तीसरा प्रदेशस्थान होता है, इस प्रकार उस स्थिति - विशेषमें उत्तरोत्तर एक-एक प्रदेशसे अधिक द्रव्यरूप अनन्त स्थान होते है ॥२२॥ शंक्राचू०-किस कारणसे अनन्त स्थान होते है १ ॥ २३॥ समाधानचू०-क्योंकि, कर्म-क्षपण- लक्षण - क्रियाकी परिपाटी से जो जो द्रव्य क्षपणको प्राप्त हुआ है, उससे भी उत्कृष्ट द्रव्य समयप्रवद्धमात्र (अधिक) होता है, अतएव अनन्त स्थान बन जाते है ॥२४॥ चूर्णिसू० - किन्तु उस एक स्थितिविशेषमे जो उत्कृष्ट गत विशेष है, वह असंख्यात समयप्रवद्धप्रमाण है । अर्थात् गुणितकर्माशिक जीवके उत्कृष्ट द्रव्यमेने उसीके जघन्य द्रव्यके निकाल देने पर जो शेप द्रव्य रहता है, वह असंख्यात समयप्रवद्धप्रमाण है । इसका अभिप्राय यह हुआ कि इस एक निपेक स्थिति मे असंख्यात समयप्रवद्धमात्र प्रदेशस्थान निरन्तर उत्पन्न होते हुए पाये जाते है । किन्तु यह उत्कृष्टगत विशेष उस जघन्य सत्कर्मरूप प्रदेशस्थानके असंख्यातवे भागप्रमाण ही होता है, अर्थात् जघन्यप्रदेश सत्कर्मस्थानके असंख्यातवे भागमात्र यहॉपर निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हुए प्रदेश - सत्कर्मस्थान पाये जाते है, इस कारण इस स्थितिविशेषमे एक ही स्पर्धक होता है । दो स्थितिविशेषो प्रदेशाम दो स्पर्धकप्रमाण होते है । इस प्रकार एक समय कम आवलीमात्र स्पर्धक पाये जाते है । अन्तिम स्थिति-संडके चरम समयमे जघन्य स्पर्धकको आदि करके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मस्थान प्राप्त होने तक एक स्पर्धक पाया जाता है ।। २५-३० ॥ चूर्णिसू० - सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसत्कर्म किसके होता है ? जो उसी प्रकार से अर्थात् मिथ्यात्वके जघन्य द्रव्यके समान ही सूक्ष्मनिगोदिया जीवामं कर्मस्थितिप्रमाण रहकर पुन: वहाँसे निकलकर और सजीवांमे उत्पन्न होकर संयमासंयम, संयम और
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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