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________________ १६८ कसाय पाहुड सुत्त --- [४ अनुभागविभक्ति - ११३. णाणाजीवेहि कालो ११४. मिच्छत्तस्स उकस्साणुभागकम्मंसिया केवचिरं कालादो होति ? ११५. जहपणेण अंतोमुहुत्तं । ११६. उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो । ११७. एवं सेसाणं कम्माणं सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तवजाणं । ११८. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागसंतकम्मिया केवचिरं कालादो होति ? ११९. सव्बद्धा । १२०. मिच्छत्त-अट्ठकसायाणं जहण्णाणुभागसंतकम्मिया केवचिरं कालादो होंति ? १२१. सम्बद्धा । १२२. सम्मत्त-अणंताणुबंधिचत्तारि-चदुसंजलणतिवेदाणं जहण्णाणुभागकम्मंसिया केवचिरं कालादो होति ११२३. जहण्णेण एगसमओ। १२४. उक्कस्सेण संखेज्जा समया । १२५. णवरि अणंताणुबंधीणमुक्कस्सेण आवलियाए असंखेज्जदिभागो। १२६. सम्मामिच्छत्त-छण्णोकसायाणं जहण्णाणुभागकम्मंसिया चूर्णिसू०-अव नानाजीवोकी अपेक्षा अनुभागविभक्तिसम्बन्धी काल कहते हैमिथ्यात्वकर्मके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मवाले जीवोका कितना काल है ? जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पल्योपमका असंख्यातवां भाग है ॥११३-११६॥ विशेषार्थ-इन दोनो कालोका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अनुभागवंध करनेवाले सात आठ जीवोके अन्तर्मुहूर्तकाल तक उस अवस्थामे रहकर तत्पश्चात् उत्कृष्ट अनुभागका घात करनेपर जघन्य काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण पाया जाता है । मिथ्यात्वकर्मके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मका उत्कृष्टकाल पल्योपमका असंख्यातवा भाग है । इसका कारण यह है कि एक जीवसम्बन्धी उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मका काल अन्तर्मुहूर्त होता है और मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट अनुभागविभक्ति करनेवाले जीव एक साथ अधिकले अधिक पल्योपमके असंख्यातवे भागमात्र होते हैं, अतएव उतनी शलाकाओसे उक्त अन्तर्मुहूर्तको गुणा कर देनेपर पल्योपमका असंख्यातवें भागमात्र उत्कृष्टकाल प्राप्त होता है। चूर्णिम०-इसी प्रकार सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दो प्रकृतियाको छोड़कर शेप कर्मोंका उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिसम्बन्धी काल जानना चाहिए । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनो प्रकृतियोके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मवाले जीवोका कितना काल है ? सर्व काल है ॥११७-११९॥ . विशेषार्थ-इसका कारण यह है कि एक जीवके उत्कृष्ट अनुभागमे अवस्थानकालकी अपेक्षा उसे प्राप्त होनेवाले जीवोका अन्तरकाल असंख्यातगुणित हीन होता है।। . चूर्णिसू०-मिथ्यात्व और आठ मध्यम कपायोके जघन्य अनुभाग सत्कर्मवाले जीवोका कितना काल है ? सर्वकाल है । क्योकि, इन सूत्रोक्त सभी कर्मोंके जघन्य अनुभागवाले जीवोका किसी भी काल मे विरह नही होता है। सम्यक्त्व, अनन्तानुवन्धी-चतुष्क, संज्वलन-चतुष्क और तीनो वेद, इन प्रकृतियोके जघन्य अनुभाग सत्कर्मवाले जीवोका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। केवल अनन्तानुवन्धी चागे कपायोका जघन्य अनुभाग-सम्बन्धी उत्कृष्ट काल आवलीका असंख्यातवॉ
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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