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________________ १४४ कसाय पाहुड सुत्त [३ स्थितिविभक्ति ३८४. इमाणि अण्णाणि अप्पाबहुअस्स साहणाणि कायव्वाणि । ३८५. तं जहा । सव्वत्थोवा चरित्तमोहणीयक्खवयस्स अणियट्टिअद्धा । ३८६. अपुचकरणद्धा संखेज्जगुणा । ३८७. चारित्तमोहणीयउवसामयस्स अणियट्टिअद्धा संखेज्जगुणा ३८८. अपुवकरणद्धा संखेज्जगुणा । ३८९. दंसणमोहणीयक्खवयस्स अणियट्टिअद्धा संखेज्जगुणा । ३९०. अपुव्यकरणद्धा संखेज्जगुणा । ३९१. अणंताणुवंधीणं विसंजोएतस्स अणियट्टिअद्धा संखेज्जगुणा । ३९२. अपुवकरणद्धा संखेज्जगुणा । ३९३. दसणमोहसे संख्यातगुणित काल तक उनका वध करते हुए स्त्रीवेदका बन्धकाल समाप्त हो गया और तव उसने अनन्तर समयमे नपुंसकवेदका बन्ध प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार उसके नपुंसकवेदके साथ हास्य और रतिको बाँधते हुए पूर्व बन्धकालसे संख्यातगुणित काल तक बन्ध करनेके अनन्तर हास्य-रतिका वन्धकाल समाप्त हो गया । तब उसने नपुंसकवेदके साथ अरति और शोकका बन्ध प्रारम्भ किया। इस प्रकार नपुंसकवेदके साथ अरति-शोकका बन्ध करते हुए उसके पूर्व बन्धकालसे संख्यातगुणित काल व्यतीत होनेपर नपुंसकवेदका वन्धकाल और अरति-शोकका बन्धकाल, ये दोनो ही एक साथ समाप्त हो गये । उक्त जीवके नोकषायोके बन्धकालका अल्प-बहुत्व अंकोकी अपेक्षा इस प्रकार होगा-पुरुषवेदका बन्धकाल सबसे कम २, स्त्रीवेदका बन्धकाल संख्यातगुणित ८, हास्य-रतिका बन्धकाल संख्यातगुणित ३२, अरति-शोकका बन्धकाल संख्यातगुणित १२८, और नपुंसकवेदका बन्धकाल विशेष अधिक १५० होगा। चूँ कि, सातो नोकपायोके स्थितिबन्धकाल विसदृश है, इसलिए उनके स्थितिसत्त्वस्थान भी सदृश नही होते है । अतएव यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि मिथ्यादृष्टि जीवमे उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्मस्थान समान होते हुए भी जघन्य स्थितिवन्धस्थानोके विसदृश होनेसे जघन्य स्थितिसत्कर्मस्थान भी विसदृश और अधिक होते है। उपयुक्त एक प्रकारसे मोहनीयकर्मके स्थितिसत्कर्मस्थानोका अल्पवहुत्व साधन करके अब अन्य प्रकारसे अल्पवहुत्व साधन करनेके लिए उत्तरसूत्र कहते है __ चूर्णिसू०-मोहनीयकर्मके स्थिनिसत्कर्मस्थानसम्बन्धी अल्पवहुत्वके ये अन्य भी साधन निरूपण करना चाहिए । वे साधन इस प्रकार है-चारित्रमोहनीयकर्मके क्षपण करनेवाले जीवके अनिवृत्ति करणका काल आगे कहे जानेवाले सभी पदोकी अपेक्षा सबसे कम है । चारित्रमोहनीय-क्षपकके अनिवृत्तिकरण-कालसे उसीके अपूर्वकरणका काल संख्यातगुणित है। चारित्रमोहनीय-क्षपकके अपूर्वकरणकालसे चारित्रमोहनीयकर्मके उपशमन करनेवाले जीवके अनिवृत्तिकरणका काल संख्यातगुणित है । चारित्रमोहनीयउपशामकके अनिवृत्तिकरण-कालसे उसीके अपूर्वकरणका काल संख्यातगुणित हैं। चारित्रमोहनीय-उपशामकके अपूर्वकरणकालसे दर्शनमोहनीयकर्मके क्षपण करनेवाले जीवके अनिवृत्तिकरणका काल संख्यातगुणित है । दर्शनमोहनीय-क्षपकके अनिवृत्तिकरण-कालसे उसीके अपूर्वकरणका काल संख्यातगुणित है । दर्शनमोह-क्षपकके अपूर्वकरण-कालसे अनन्तानुवन्धी चारो कपायोकी विसंयोजना करनेवाले जीवके अनिवृत्तिकरणका
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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