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________________ २७२ जैनागम स्तोक संग्रह १० विभंग ज्ञान में-जीव का भेद २ संज्ञी का, गुणस्थानक २पहला और तीसरा, योग १३, उपयोग ६, लेश्या ६। समुच्चय ज्ञान प्रमुख दश बोल में रहे हुए जीवो का अल्पबहुत्व१ सब से कम मन पर्यव ज्ञानी, २ इससे अवधिज्ञानी असख्यात गुणा ३ इससे मति ज्ञानी व ४ श्रु त ज्ञानी परस्पर बराबर व पूर्व से विशेषाधिक ५ इससे विभग ज्ञानी असंख्यात गुणा ६ इससे केवलज्ञानी अनन्त गुणा ७ इससे समुच्चय ज्ञांनी विशेषाधिक ८ इससे मति अज्ञानी व ६ श्रुत अज्ञानी परस्पर वराबर व पूर्व से अनन्त गुणे । १० इससे समु च्चय अज्ञानी विशेषाधिक । ११ दर्शन द्वार :-१ चक्षु दर्शन में-जीव का भेद ६-चौरिन्द्रिय, असज्ञी पंचेन्द्रिय, सज्ञी पंचेन्द्रिय इन तीन का अपर्याप्त और पर्याप्त ; गुणस्थानक १२ प्रथम ; योग १४-कार्मण को छोड़कर, उपयोग १०केवल के दो छोड़कर ; लेश्या ६ । । । २ अचक्षु दर्शन में जीव का भेद १४, गुणस्थानक १२, योग १५, उपयोग १०, लेश्या ६ ।। ___३ अवधि दर्शन में-जीव का भेद २-संज्ञी का, गुणस्थानक १२, योग १५, उपयोगः १०, लेश्या ६ । ४ केवल दर्शन में-जीव का भेद १संज्ञी पर्याप्त, गगस्थानक २१३ वां, १४ वा, योग ७ केवल ज्ञानवत्, उपयोग २-केवल का, लेश्या १ शुक्ल । चक्ष दर्शन प्रमुख चार बोल में रहे हुए जीवों का अल्पबहुत्व :१ सबसे कम अवधि दर्शनी २ इससे चक्षु दर्शनी असंख्यात गुणा ३ इससे केवलदर्शनी अनन्त गुणा १ इससे अचक्षु दर्शनी अनन्त गुणा । १२ संयत द्वारः-१ सयत (समुच्चय संयम) में - जीव का भेद १ सज्ञी का पर्याप्त, गुणस्थानक ६-छ8 से चौदहवे तक, योग १५, उपयोग :-तीन अज्ञान के छोड़कर; लेश्या ६ ।
SR No.010342
Book TitleJainagam Stoak Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMaganlal Maharaj
PublisherJain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar
Publication Year2000
Total Pages603
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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