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________________ २५८ जैनागम स्तोक संग्रह ख्यात गणा, इससे स्पर्शे० का अवगाह्य संख्यात गुणा । इससे चक्षु. का प्रदेश अनन्त गुणा, इससे श्रोत्रे का प्रदेश संख्यात गुणा, इससे घ्राणे० का प्रदेश संख्यात गुरणा, इससे रसे० का प्रदेश असख्यात गुणा व इससे स्पर्शे० का प्रदेश असख्यात गुणा। कर्कश व भारी स्पर्श का अल्पबहुत्व :-सबसे कम चक्षु इन्द्रिय का कर्कश व भारी स्पर्श, इससे श्रोत्रे० का अनन्त गुणा, इससे घ्राणे० का अनन्त गुणा, इससे रसनेन्द्रिय का अनन्त गुणा, इससे स्पर्श० का अनन्त गुणा। हलका व मृदु स्पर्श का अल्पबहुत्व:-सब से कम स्पर्शे० का हलका व मृदु स्पर्श, इससे रसे० का हलका मृदु स्पर्श अनत गुणा, इससे घ्राणे० का अनंत गुणा, इससे श्रोत्रे० का अनंत गुणा व इससे चक्ष . का अनंत गुणा। कर्कश भारी, लघु (हलका) मृदु स्पर्श का एक साथ अल्पबहुत्व :सबसे कम चक्षु० का कर्कश भारी स्पर्श, इससे श्रोत्रे का कर्कश भारी स्पर्श अनंत गुणा, इससे घ्राणे० का अनत गुणा, इससे रसे० का अनंत गुरणा, इससे स्पर्श० का अनत गुणा, इससे स्पर्श का हलका मृदु स्पर्श अनंत गुणा, इससे रसे० का हल्का मदु स्पर्श अनत गुणा, इससे घ्राणे० का हलका मृदु स्पर्श अनंत गुणा, इससे श्रोत्रे० का हलका मृदु स्पर्श अनंत गुणा व इससे चक्षु ० का हलका मृदु स्पर्श अनंत गुणा। ७ पृष्ट द्वार जो पुद्गल इन्द्रियों को आकर स्पर्श करते है, उन पुद्गलो को इन्द्रिये ग्रहण करती है। पांच इन्द्रिय मे से चक्षु इन्द्रिय को छोड़ शेप चार इन्द्रियो को पुद्गल आकर स्पर्श करते है। चक्षु इन्द्रिय को आकर नही स्पर्श करते है।
SR No.010342
Book TitleJainagam Stoak Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMaganlal Maharaj
PublisherJain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar
Publication Year2000
Total Pages603
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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