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________________ 1 जैनागम स्तोक संग्रह १६ योग : - इनमें योग ११ :- १ सत्य मन योग २ असत्य मन योग ३ मिश्र मन योग ४ व्यवहार मन योग ५ सत्य वचन योग ६ असत्य वचन योग ७ मिश्र वचन योग ८ व्यवहार वचन योग & औदारिक शरीर काय योग १० औदारिक मिश्र शरीर काय योग ११ कार्माण शरीर काय योग । ११८ १७ उपयोग द्वार : - 'पाँच देव कुरु, पाँच उत्तर कुरु में उपयोग ६ – १ मति ज्ञान २ श्रुत ज्ञान ३ मति अज्ञान ४ श्रुत अज्ञान ५ चक्षु दर्शन ६ अचक्षु दर्शन । शेष वीस अकर्म भूमि व छप्पन अन्तर द्वीप में उपयोग ४ :- -१ मति अज्ञान, २ श्रुत अज्ञान ३ चक्षु, दर्शन ४ अचक्ष. दर्शन । १८ आहार द्वार : - युगलियों में आहार तीन प्रकार का । १६ उत्पत्ति द्वार व २२ च्यवन द्वार : - तीस अकर्म भूमि में दो दण्ड का आवे १ मनुष्य २ तिर्यञ्च और १३ दण्डक में जावे— दश भवन पति के दश दण्डक, एक वाणव्यन्तर का एक ज्योतिषी ET, एक वैमानिक का एव तेरह दण्डक । , छप्पन अन्तर् द्वीप में दो दण्डक का आवे मनुष्य और तिर्यच और ग्यारह दण्डक में जावे - १० भवनपति और एक वारण- व्यन्तर एव ग्यारह जावे । - २० स्थिति द्वार – हेमवय, हिरण्य वय में जघन्य एक पल्य में देश उण, उत्कृष्ट एक पल्य की । हरिवास रम्यक्वास में जघन्य दो पल्य में देश उण, उत्कृष्ट दो १. ३० अकर्म भूमि मे ६ उपयोग ( २ ज्ञान, २ अज्ञान, २ दर्शन ) और ५६ अन्तरद्वीप मे ४ उपयोग ( २ अज्ञान, २ दर्शन ) ही होते है ऐसा अन्य ग्रंथो मे वर्णन है ।
SR No.010342
Book TitleJainagam Stoak Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMaganlal Maharaj
PublisherJain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar
Publication Year2000
Total Pages603
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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