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( २८ ) करके सौखामण दीधौ नबरी ॥ सर्व जीवोंसें किया खांमणा ॥ बार वार मुखसे उचरी मा०॥७॥ भाद्रव शद वारस संध्याक ॥ प्रति कमण शुध भावकरौं ॥ अठ दश पाम भालोवौ स्वामजी ॥ पहुंता गणिवर वर्ग सरी । ॥ मा० ॥८॥ दूण कलुकालमें एहवो गणि वर दीपायो जिन माग खरौ ॥ याद आया सनमन विकसावै ॥ भवि जनक हिय उल्लसरी ॥ प्रा० ॥६॥ जीरावर है दाश आपको ॥ नपन करत पल घरी घरी ॥ उर बिच ध्यान लग्यो गणि तेरो॥ एरावत ज्य बन कजरी ॥ प्रा० ॥ १० ॥ छासठ संवत कुंवार शुक्ल पक्षं ॥ परव दशेरो दिन जबरी ॥ हर्षर गणिवर गुण गाया ॥ कलकत्तो है महानगरौ । मा० ॥ ११॥ इति।
अथ श्री डालचंदनी म्हाराजके गुणांका समस्या पूरतीका श्लोक ॥ समस्या एह छै