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श्रीकृष्ण - कथा - वसुदेव का पूर्वभव
-भद्र | साधु-सेवा का व्रत लेकर भी तुम इस समय पारणे के लिए कैसे बैठ गये
मुनि के वचन सुन कर नदिपेण उत्सुक होकर उनकी ओर देखने
लगे ।
मुनि रूपधारी देव ने ही पुन कहा
-नगर के बाहर वन मे अतिसार रोग से पीडित मुनि भूखे-प्यासे पडे है ।
यह सुनते ही नदिपेण ने आहार छोड़ा और उठकर प्रासुक पानी की खोज मे चल दिये । शुद्ध जल की प्राप्ति मे देव ने अनेक विघ्न किये किन्तु कठिन अभिग्रह वाले नदिषेण के सम्मुख उसकी शक्ति सफल न हो सकी । मुनि प्रासुक जल लेकर वन मे गये । वहाँ उन्हे अतिसार से पीडित मुनि दिखाई पडे । मुनि का शरीर मलमूत्र आदि के कारण दुर्गन्धयुक्त था । उनके पास ठहरना भी कठिन था किन्तु न दिषेण ने दुर्गन्ध को दुर्गन्ध नही समझा और वे पीडित मुनि के पास पहुँचे । उन्हे देखकर रोगी साधु ने आक्रोशपूर्वक कठोर शब्द कहे
- मै तो इस दशा मे पडा हूँ और तुम भोजन मे लपट हुए यहाँ इतनी देर मे आये । धिक्कार है तुम्हारी साधु सेवा की प्रतिज्ञा को । नदिषेण ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया -
- हे मुने । मेरे अपराध को क्षमा करिए। मैं शुद्ध जल लाया हूँ ।
यह कहकर नदिपेण ने उन्हे प्रासुक जल का पान कराया और कहा - आप जरा बैठ जाइये। मैं आपके शरीर को साफ कर दूं ।
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- देखते नही मैं कितना अशक्त हूँ ? - मुनि ने कुपित मुद्रा मे कहा । नदिषेण ने विना खेद किये उनके अगो का प्रक्षालन किया और कधे पर बिठाकर उपाश्रय की ओर चल दिये ।