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________________ महाकवि पुष्पदन्त ३१९ किसका हृदय नहीं चाहता। इस महाकविको आश्रय देकर और प्रेमपूर्ण आग्रहसे महापुराणकी रचना कराके सचमुच ही भरतने वह काम किया, जिससे कविके साथ उनकी भी कीर्ति चिरस्थायी हो गई । जैनमन्दिर और वापी, कूप, तड़ागादि तो न जाने कब नामशेष हो जाते। ___ पुष्पदन्त जैसे फक्कड़, निर्लोभ, निरासक्त और ससारसे उद्विग्न कविसे महापुराण जैसा महान् काव्य बनवा लेना भरतका ही काम था। इतना बड़ा आदमी एक अकिंचनका इतना सत्कार, इतनी खुशामद करे और उसके साथ इतनी सहृदयताका व्यवहार करे, यह एक बड़ी भारी बात है। पुष्पदन्तकी मित्रता होनेसे भरतका महल विद्याविनोदका स्थान बन गया । वहाँ पाठक निरन्तर पढ़ते थे, गायक गाते थे और लेखक सुन्दर काव्य लिखते थे। गृह-मन्त्री नन्न ये भरतके पुत्र थे। नन्नको महामात्य नहीं किन्तु वल्लभनरेन्द्रका गृहमन्त्री लिखा है । उनके विषयमें कविने थोड़ा ही लिखा है परन्तु जो कुछ लिखा है, उससे मालूम होता है कि वे भी अपने पिताके सुयोग्य उत्तराधिकारी थे और कविका अपने पिताके ही समान आदर करते थे, तथा अपने ही महलमें रखते थे । नागकुमारचरितकी प्रशस्तिके अनुसार वे प्रकृतिसे सौम्य थे, उनकी कीर्ति १ वापीकूपतडागजैनवसतीस्त्यक्त्वेह यत्कारितं, भव्यश्रीभरतेन सुन्दरधिया जैनं पुराणं महत् । तत्कृत्वा प्लवमुत्तमं रविकृतिः (?) संसारवार्धेः सुखं कोऽन्यत् स्रसहसो ( ? ) स्ति कस्य हृदयं तं वन्दितुं नेहते ॥ २ इह पठितमुदारं वाचकैर्गीयमानं इह लिखितमजस्रं लेखकैश्चारुकाव्यं । गतिवति कविमित्रे मित्रतां पुष्पदन्ते भरत तव गृहेस्मिन्भाति विद्याविनोदः । ३ सुहतुंगभवणवावारभारणिन्वहणवीरधवलस्स । कोंडिल्लगोत्तणहससहरस्स पयईए सोमस्स ॥ १ कुंदव्वागन्भसमुन्भवस्स सिरिभरहभट्टतणयस्य । जसपसरभरियभुवणोयरस्स जिणचरणकमलभसलस्स ॥ २ अणवरयरइयवरजिणहरस्स जिणभवणपूयणिरयस्स ॥
SR No.010293
Book TitleJain Sahitya aur Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherHindi Granthratna Karyalaya
Publication Year1942
Total Pages650
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size62 MB
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