SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 203
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ग शरीरमें उपनो, पमिया चांदा ने अशका रे॥ हाय हाय करे नहिं, नहिं करे मनमां टशका रे॥ शो० ॥३॥ शोल रोग मांहेलो, अथवा अने रो कोइरे ॥ संथारो समनावे करे, हरख मनोर थ होईरे॥शो० ॥४॥ पुंडरिक संजम आद रयो, सोपी नाइने ऋद्धिरे।। पारणे पीडा उपनी, पोहोता सरवारथ सिद्दी रे ॥शो० ॥५॥राय जदाइ मोटको, लीधो संजमनारो रे ॥ रोगपरि सह जीतिने, सुख पाम्या श्रीकारोरे ॥ शो०॥ ॥६॥सनतकमार चोथो चक्री. रोगें पीमित का योरे ॥ देवता पारिखां करी, धरम शुक ल ध्यान ध्यायोरे ॥ शो० ॥७॥शोलमो परि सह एहयो, सेवे मुनीसर शूरारे ॥ कायर नाव श्राणे नहि, करम करे चकचूरा रे ॥शो०॥८॥ दुहा ॥ तृणास परिसह एहवो. सेवे साधु निग्रंथ ॥ उंची नीची जूमि समि करे नही, सा धे मुगतरोपंथ॥१॥अथ तृणफास परिसह १७ ... ढाल १७ मी ॥ सत्तरमो परिसह सांनलो रे, तुएफास ने तिणरो नाम ॥ घरं गेमी सनम लीयो, सारयां मातम काम ॥ १॥परहरीया प
SR No.010224
Book TitleJain Dharm Gyan Prakashak Pustak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNana Dadaji Gund
PublisherNana Dadaji Gund
Publication Year
Total Pages211
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy