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________________ १८० सिंहत || उनलुं मैलुंमिल्यां थकां पाले पूर ण प्रीत ॥ १ ॥ अथ अचेल परिसह ॥ ६ ॥ ढाल ६ ठी ॥ अचेल परिसह वे एहवोजी, व स्त्र जीरण पास ॥ नवो तो नेमो दीसे नही जी, शोच नही मनमाय ॥ १ ॥ एहवा मुनिवर वं दिये जी ॥ ए कणी ॥ हीन दीन वचनें करी जी, जाचे नही मुनि चीर ॥ सहजे मिले तो हि जोगवे जी, शेंठा रहे सवीर || एह० ॥२॥ मैला पेरण ने लूगमा जी, धोइ न उतारे मेल ॥ ज्ञानी देवायें एहवो कह्यो जी, साधुजीनो मा गर नही सहेल | ए० ॥ ३ ॥ संचय करे नही ठो रेहेवे जी, ते कहिजें सुध साध ॥ अधि कुं न राखे आरजमें जी, लोपे नही कुलमरजा द ॥ ९० ॥ ४ ॥ अचेल परिसह एहवो जी, सेवे मोहोठा अणगार || सोम देव ब्राह्मणनी• परें जी, सफल करे अवतार ॥ ए० ॥ ५ ॥ सुहा || बहु ऋतु में पाले साधु जी, जलो पा ले संजम नार ॥ रति अरति आगे नही, श्र 'चल रहे एकलधार ॥ १ ॥ च्प्रथ रति परिसह ॥ ७॥ ढाल ॥ ७ मी ॥ वाणी सुणी जगवाननी,
SR No.010224
Book TitleJain Dharm Gyan Prakashak Pustak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNana Dadaji Gund
PublisherNana Dadaji Gund
Publication Year
Total Pages211
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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