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________________ ये निन्हव किसी अभिनिवेश के कारण आगमिक परम्परा से विपरीत अर्थ प्रस्तुत करनेवाले होते हैं। प्रथम निन्हव महावीर के जीवन काल में ही उनकी ज्ञानोत्पत्ति के चौदह वर्ष बाद हुआ । इसके दो वर्ष बाद ही द्वितीय निन्हव हुआ। शेष निन्हव महावीर के निर्वाण होने पर क्रमशः २१४, २२०, २१८, ५४४, ५८४ और ६०९ वर्ष बाद उत्पन्न हुए। सिवात्त भंद से प्रथम सात निन्हवों का उल्लेख मिलता है। पर जिनभद्र ने 'विशंषावश्यक भाष्य' में एक और निन्हव जोड़कर उनकी संख्या ८ कर दी । इसी अष्टम निन्हव को 'दिगम्बर' कहा गया है। आश्चर्य की बात है, इन निन्हवों के विषय में दिगम्बर साहित्य बिलकुल मौन है । प्रथम सात निन्हवों के कारण किसी सम्प्रदाय विशेष की उत्पत्ति नहीं हुई । 'ठाणाङ्गसूत्र' (सूत्र ५८०) में केवल सात निन्हवों का उल्लेख है पर 'आवश्यकनियुक्ति' (गाथा-७७९-७८३) में स्थानकाल का उल्लेख करते समय आठ निन्हवों का और उपसंहार करते समय मात्र सात निन्हवों का निर्देश किया गया है। इससे यह स्पष्ट है कि जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ने ही सर्वप्रथम अष्टम निन्हव के रूप में दिगम्बर मत की उत्पत्ति की कल्पना की है। उन्होंने यह भी कहा है कि उपयुक्त संहननादि का अभाव होने से जिनकल्प का धारण करना अब शक्य नहीं। इससे यह स्पष्ट है कि दिगम्बर सम्प्रदाय की उत्पत्ति अर्वाचीन नहीं, प्राचीनतर है । ऋषभदेव ने जिनकल्प की ही स्थापना की थी और वह अविच्छिन्न रूप से श्वेताम्बर सम्पद्राय के अनुसार भी जम्बूस्वामी तक चला आया । बाद में उसका विच्छेद हुआ । शिवभूति ने उसकी पुनः स्थापना की। अतः जिनकल्प को निन्हव कसे कहा जा सकता है ? और फिर बोटिक का सम्बन्ध दिगम्बर सम्प्रदाय से कैसे लिया जाय, इसका स्पष्टीकरण श्वेताम्बर साहित्य में भी नहीं मिलता । सम्भव है, बोटिक नाम का कोई पृथक् सम्प्रदाय ही रहा होगा जिसका अधिक समय तक अस्तित्व नहीं रह सका । आवश्वक चूणि (पृ. २०) में बोटिकों को अवन्द्य श्रमणों में गिना गया है । श्वेताम्बर सम्प्रदाय की उत्पत्ति : दिगम्बर साहित्य में श्वेताम्बर सम्प्रदाय की उत्पत्ति के विषय में जो कथानक मिलते हैं वे इस प्रकार है (१) हरिषेण के वृहत्कथाकोश (शक संवत् ८५३) में यह उल्लेख मिलता है कि गोवर्धन के शिष्य श्रुतकेवली भद्रबाहुने उज्जयिनी में द्वादशवर्षीय १. एवं एए कहिबा बोसप्पिणिए उ निण्हया सत्त । बीरपरस्स परयणे सेसाणं एवणे नत्ति ॥ ७८४ ॥
SR No.010214
Book TitleJain Darshan aur Sanskriti ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhagchandra Jain Bhaskar
PublisherNagpur Vidyapith
Publication Year1977
Total Pages475
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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