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६- (घटः) स्यान्नास्ति च अवक्तव्यश्च-घट् कथंचित-अस्तित्वशून्य और अवक्तव्य
७- (घटः) स्यात् अस्ति च, नास्ति च, अवक्तव्यश्च- घट् कथंचित् अस्तित्वयुक्त,
अस्तित्वशून्य और अवक्तव्य है। इन विरोधी धर्मों की विवक्षा ‘स्यात्' से ही संभव है। इस दर्शन में यह माना गया है कि एक वस्तु को जो व्यक्ति पूरी तरह जानता है वह सारे वस्तुओं का ज्ञाता है और जो सारे वस्तुओं का ज्ञाता है वही एक वस्तु का पूर्ण ज्ञाता होता है।' द्रव्य विचार
'गुण पर्यायवद् द्रव्यम्'। जिसमें 'गुण' व 'पर्याय' हो वह द्रव्य है। जैन दर्शन में सात पदार्थ माने गये हैं- जीव, अजीव, आसव, बन्ध, सम्वर, निर्जरा, मोक्ष।
जैनों के मतानुसार द्रव्य का विभाजन दो वर्गों में हुआ है १- अस्तिकाय, २अनस्तिकाय। काल ही ऐसा द्रव्य है जिसमें विस्तार नहीं है। और काल को छोड़कर सभी द्रव्यों को अस्तिकाय द्रव्य कहा जाता है। अस्तिकाय का विभाजन जीव और अजीव में होता है।
द्रव्य
. बहुदेशव्यापी) अस्तिकाय
अनस्तिकाय काल (एकदेशव्यापी)
जीव
अजीव
'एको भावः सर्वथा येन द्रष्टः सर्वे भावा सर्वथा तेन द्रष्टा । सर्वेभावा. सर्वथा येन द्रष्टा एकोभाव सर्वथा तेन द्रष्टाः ।। (षडदर्शन समु० टीका पृ० २३२)
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