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धूर्त चार्वाक् आत्मा और शरीर की अभिन्नता को मानते हैं जबकि सुशिक्षित नहीं । चार्वाक् मानता है कि आत्मा अमर नहीं है शरीर नाश से आत्मा का नाश है वर्तमान जीवन के अतिरिक्त और कोई दूसरा जीवन नहीं है। पुनर्जन्म को मानना निरर्थक है।
नैतिक विचार
भारतीय दर्शन में अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष ये चार पुरूषार्थ माने गये हैं, ये चारों जीवन के चरमलक्ष्य हैं। अतएव इसे निःश्रेयस भी कहते हैं । इन चारों में आस्तिक धर्म और मोक्ष को पुरूषार्थ मानते हैं और नास्तिक लोग अर्थ और काम को "अर्थकामौ पुरुषार्थे" । (वार्ह०सू० २७)
चार्वाक् दर्शन केवल 'काम' को ही पुरूषार्थ मानता है "काम एवैकः पुरुषार्थः।” क्योंकि अर्थ काम का सहायक है इसलिये ये लोग अर्थ की सत्ता भी स्वीकार करते हैं । चार्वाक् दर्शन का सिद्धान्त 'सुखवादी' सिद्धान्त कहलाता है, स्वेच्छारपूर्वक सुखमय जीवन व्यतीत करना ही पुरूषार्थ हैं अपने पास द्रव्य न रहने पर भी कर्ज लेकर घी पीना चाहिये, कर्ज को लौटाने की चिन्ता व्यर्थ है क्योंकि शरीर के भस्म होने पर जीव लौटकर आने वाला नहीं ।
" यावत् जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य किं पुनरागमनं कुतः ।।
(बार्हस्प० सूत्र )
कुछ लोगों का तथा श्रुतियों का मत है कि सुख भोग क्षणिक होता है अतः मिथ्या है किन्तु इसके उत्तर में चार्वाक् कहते हैं कि ऐसा मानना ठीक नहीं है क्योंकि मालती कुसुम की आयु, किंशुक के समान दीर्घनहीं होती तब भी उसे कोई मिथ्या मानकर त्याग नहीं देता है । कुछ लोगों का कहना है कि सुख दुःख से मिश्रित है अतः
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