________________
सभी आस्तिक दर्शनों में आत्मा को शरीर से भिन्न नित्य, अपरिगाामी, कूटस्थ आदि माना गया है और शरीर के धर्म आत्मा के धर्म नहीं है। चार्वाक आत्मा को शरीर से पृथक नहीं मानता है जिस प्रकार शरीर अनित्य, परिणामी, विकारी है वैसे आत्मा भी है। आत्मोत्पत्ति के सम्बन्ध में चार्वाक दर्शन का स्पष्ट सिद्धान्त है जड़ पदार्थों के विकार से चैतन्य उसी प्रकार उत्पन्न होता है जैसे पान-सुपारी और चूने के योग से पान की लाली निकलती है, जैसा कि सर्वदर्शन संग्रह में कहा गया है
'जड़भूत विकारेषु चैतन्यं यत्तुदृश्यते।
ताम्बूल पूगचूर्णानां योगादिद्राग इवात्यितम्' ।। आत्मा को भूत चतुष्टय का सम्मिलित संघात कहा है। आत्मा के सम्बन्ध में चार्वाक दर्शन में चार सिद्धान्त प्रचलित है
१- शरीरात्मवाद। २- इन्द्रियात्मवाद ।
३- मनात्मवाद। ४- प्राणात्मवाद । शरीरात्मवाद की मान्यता के अनुसार शरीर को ही आत्मा स्वीकार किया गया है, 'मैं मोटा हूँ', 'मैं तरूण हूँ, मैं वृद्ध हूँ', इन विशेषणों के प्रयोग से सिद्ध है कि शरीर ही आत्मा है 'चैतन्य विशिष्ट देह एवं आत्मा' और आत्मा ही देह है अत: चार्वाक के इस अभेदात्मक आत्मविचार को देहात्मवाद भी सर्वदर्शन संग्रह में कहते हैं
'स्थूलोऽहं तरूणोवृद्धों युवेत्यादि विशेषणेः ।
विशिष्टो देह एवात्मा न ततोऽन्यो विलक्षणः ।।' चार्वाक देह आत्मा के सम्बन्ध में कहता है कि यदि शरीर से पृथक आत्मा है तो शरीर के मर जाने पर जीवात्मा का प्रत्यक्ष होना चाहिये और यदि यह कहा जाय कि आत्मा अदृश्य या गुप्त रूप से शरीर में व्याप्त रहता है तो यह भी निर्थक है क्योंकि कालान्तर में शरीरांगों के नष्ट हो जाने पर आत्मा के गुप्तरूप का अस्तित्व संभव नहीं है। चार्वाक दर्शन का कोई सम्प्रदाय स्थूल शरीर को आत्मा न मानकर इन्द्रियों को ही आत्मा