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मतभेद और संघर्ष था जो द्वितीय युग में समाप्त हो गया । किन्तु इसमें भी दो अन्य संघर्ष प्रकट हो गये । एक अद्वैत वेदान्त और वैष्णव वेदान्त के मध्य तथा दूसरा न्याय दर्शन और अद्वैत वेदान्त का संघर्ष । इस प्रकार बहुत से विद्वानों का मत है कि शङ्कराचार्य ने बौद्ध धर्म का अन्त कर दिया । किन्तु कुछ लोगों ने शङ्कराचार्य को प्रच्छन्न बौद्ध कह कर आरोप लगाया जो कि सत्य नहीं है और इसका खण्डन बाद में वेदान्ती आचार्यों द्वारा किया गया ।
२. शङ्९ का दिव्य जन्म
शङ्करः शङ्करः साक्षच्छङ्करं तं सदानुमः । येनप्रकाशितेद्वैते वेदान्ते रमते मनः ।।
भारतवर्ष के केरल प्रान्त में पूर्ण नदी के पास वृषाद्रि नामक पर्वत पर नम्बूदरी पाद ब्राह्मण की एक टोली निवास करती थी उसमें एक परम वेदवेत्ता ब्राह्मण के घर महान शिवभक्त ‘शिवगुरु' नामक बालक का जन्म हुआ। शिवगुरु के पिता का नाम विद्याधर था जो आचार्य शङ्कर के पितामह थे। पंडित विद्याधर था जो आचार्य शङ्कर के पितामह थे। पंडित विद्याधर की विद्वता से प्रभावित होकर केरल के महाराजा (राजशेषर) ने स्वयं निर्मित शिवमन्दिर का कार्यभार विद्याधर को प्रदान किया था । विद्याधर को भगवान शिव की अनुकम्पा से 'शिवगुरु' नामक पुत्र पैदा हुआ। शिवगुरु के प्रकाण्ड पाण्डित्य, सद्गुणों और आदर्श चरित्र की ख्याति सर्वत्र फैल गई। कुछ समय पश्चात् शिवगुरु का विवाह मद्य पंडित की परम साध्वी, सुशील - कन्या 'विशिष्टा देवी' के साथ हुआ । विविध ग्रन्थों में विशिष्टा के विविध नाम जैसे सती, कामाक्षी, आर्या आदि मिलते हैं । किन्तु विद्वानों का एक बड़ा वर्ग विशिष्टा नाम को ही मानता है । शिवगुरु और विशिष्टा देवी विरक्त स्वभाव होने के कारण बहुत दिन तक सन्तान हीन रहे हैं। दोनों ने प्रौढ़ावस्था में वृषपर्वत पर चन्द्रमौलीश्वर देवता की शरण ली और
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