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द्रविणाचार्य के मत में अज्ञान से ही बन्धन या ससारित्व होता है और अज्ञान का दूर हो जाना ही मोक्ष है। बृहदारण्यकोपनिषद् के शाङ्करभाष्य में द्रविडाचार्य की प्रसिद्ध आख्यायिका के अनुवाद में भगवान शङ्कर ने स्पष्ट किया है। यथा- 'तुम एतद्रूपक नही हो, परब्रह्म ही हो, असंसारी हो। आचार्य ने यह उद्बोधान दिया। तब तीन एषेणाओं (पत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा) की अनुवृत्ति को त्यागकर 'मैं ब्रह्म ही है इस भाव को प्राप्त कर लेता है (वृ० आ० उ० शां० भा० २/१/२०)।
इस सिद्धान्त में जीव और ब्रह्म की एकता, अज्ञान से ही आत्मा संसारी होता है। 'तत्वमसि' इत्यादि महावाक्य ज्ञान से अज्ञान दूर होता है। और ब्रह्म की प्राप्ति या मोक्ष होता है। इन (द्रविडाचार्य) के मत में मोक्ष स्वरूप का ज्ञान है अथवा ब्रह्म की प्राप्ति मोक्ष है। विवर्तवाद और अनिर्वचनीय दोनों स्वीकृत है।
विशिष्टद्वैत ग्रन्थों में प्राप्त श्री द्रविणाचार्य के वाक्य विशेषतया उपासना परक है और परमात्मा के सगुणत्व के प्रतिपादक है। ब्रह्मसूत्र में १/१/१६, २/१/१४, ४/३/२४, ४/४/१६ सूत्रों के शाङ्कर भाष्य में ब्रह्म की सगुणरुपता उसकी उपासना और उपासना के फल की प्राप्ति का प्रतिपादन मिलता है।
__श्री शङ्कराचार्य, श्री सुरेश्वराचार्य, वाचस्पति मिश्र, मधुसूदनसरस्वती, रामतीर्थ, नृसिंहाश्रम, आनन्दगिरि आदि आचार्यों ने द्रविड़ाचार्य के प्रति पूज्यभाव प्रकट किया है।
इस प्रकार द्रविड़ाचार्य है, निर्विशेष अद्वैत ब्रह्म के प्रतिपादक और निर्विशेष ब्रह्म के अद्वैत सम्प्रदाय के परमादरणीय विद्वान इनका सिद्धान्त निर्विशेष अद्वैत ब्रह्म के परम अनुकूल है। आचार्य ब्रह्मदत्त
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