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"भगवान बोधायन द्वारा रचित विस्तीर्ण ब्रह्मसूत्रवृत्ति को पूर्वाचार्यों नें संक्षिप्त किया है। उनके प्रदर्शित मत के अनुसार सूत्राक्षरों की व्याख्या की जाती है।""
आचार्य रामानुज के इस लेख से स्पष्ट होता है कि प्राचीनकाल में बोधायन ने अति विस्तृत वृत्ति की रचना की थी जो 'प्रपञ्च हृदय' नामक ग्रन्थ से भी स्पष्ट होता है ।
मीमांसा शास्त्र का कृतकोटि नाम वाला भाष्य बोधायन ने किया इस प्रकार के विवरणों से स्पष्ट होता है कि बोधायन नें ब्रह्मसूत्र पर कृतकोटि नामक एक विस्तृत व्याख्या की रचना की । कालान्तर में उपवर्ष नें उसका संक्षेप किया' आचर्य शङ्कर नें महर्षि बोधायन का कहीं नामोल्लेख नहीं किया परन्तु कतिपय सूत्रों के भाष्य में की गई आलोचनाओं को शाङ्कर भाष्य के विवरणकारों ने 'वृत्तिकार' की आलोचना बताया है। यह बृत्तिकार ब्रह्मसूत्रों पर विस्तृत 'कृतकोटि' नामक व्याख्या लिखनें वाला बोधयन अथवा उसकी विस्तृत वृत्ति का संक्षेप करने वाला उपवर्ष हो सकता है ।
ब्रह्म, जीवात्मा तथा प्रकृति की एकता और विभिन्नता के विषय में बोधयन का क्या सिद्धान्त रहा होगा यह निश्चित रूप से कहना कठिन है क्योंकि बोधयन के बहुत थोड़े सन्दर्भ उपलब्ध हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि ये कृष्ण यजुर्वेद के आचार्य हैं। इनका मुख्य ग्रन्थ 'बोधायनधर्मसूत्र' है। यह धर्मशास्त्र कल्पसूत्र का अंश है। ’बोधायनधर्मसूत्र'में इसका उल्लेख है । यह ग्रन्थ सम्पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है। इसमें आठ अध्याय हैं, जो अधिकांश श्लोकबद्ध हैं। इसमें आपस्तम्ब तथा वसिष्ठ के अनेक सूत्र अक्षरशः प्राप्त होते हैं। यह धर्म सूत्र गौतम सूत्र से अर्वाचीन माना जाता है | इसका समय वि० पू० ५०० से २०० वर्ष है ।
1 भगवद्बोधायनकृतां विस्तीर्णा ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यायन्ते । श्री रामानुज - श्रीभाष्य (91919) पृ० १
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तस्य विंशति अध्याय निबद्धस्य मीमांसाशास्त्रस्य कृतकोटि नामधेयम भाष्यं बोधायनेन कृतम् तद् ग्रन्थ बाहुल्यभयादुपेक्ष्य किञ्चित्, संक्षिप्तमुपवर्षेण कृतम् (प्रपञ्चहृदय, उपाङ्ग प्रकरण । पृ० ३६)
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