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शंकर पूर्व वेदान्त
खण्ड-(क) योग वासिष्ठ (संक्षिप्त परिचय)
शङ्कराचार्य का समय ८ वीं सदी माना जाता है, किन्तु शङ्कराचार्य से पूर्व भी वेदान्त के अनेक आचार्य हुये हैं जिनके नामों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है किन्तु कृतियाँ उपलब्ध नहीं है।
'वसिष्ठ मुनि' के 'योगवाशिष्ठ' नामक दार्शनिक ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि शंकराचार्य के पूर्व ही वेदान्त मत का साधारण विवेचन इस ग्रन्थ में हो चुका था। यह इस बात से भी प्रमाणित हो जाता है कि वेदान्त के विद्यारण्य जैसे परवर्ती लेखकों ने अपनी कृतियों में इस ग्रन्थ के श्लोकों को यत्र-तत्र उद्धृत किया है। यथा 'विद्यारण्य' ने अपने ग्रन्थ 'पञ्चदशी' में जीवन मुक्ति विवेक प्रकरण में इस ग्रन्थ के ३५३ श्लोक उद्धृत किये हैं।
__प्राचीन वेदान्त के प्रमुख ग्रन्थों में योगवाशिष्ठ का प्रमुख स्थान है। यद्यपि योगवाशिष्ठ के रचना काल के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है, क्योंकि संस्कृत साहित्य के लेखक एवं मनीषीगण अपने विषय में सर्वथा मौन ही हैं। भारतीय भाषा के लेखक इतने से ही संतुष्ट रहते हैं कि उनकी रचना ही उनको भारतीय सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है।
डा० भीखनलाल आत्रेय इसका रचनाकाल ५०० ई० से लेकर ६५० ई० तक के बीच का समय मानते है। उनके मत के अनुसार यह शंकराचार्य के पूर्व का ग्रन्थ है। डा० एस० एन० दास गुप्ता इसको ७०० से ८०० की कृति स्वीकार करते हैं।
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