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अपने स्वरूप का दर्शन होता है और कैवल्य की सिद्धि होती है। योग दर्शन में ईश्वर को सर्वज्ञ माना गया है "तत्र निरातिशयं सर्वज्ञ बीजम् ।"" अर्थात् ज्ञान का निरातिशय होना उसकी सर्वज्ञता का द्योतक है। इस दर्शन में ईश्वर को सबका गुरू कहा गया है - जैसाकि "सर्वेषामपि गुरूः काले नानवच्छेदात " इस सूत्र से विदित होता है। ईश्वर के चिन्तन से प्रत्येक चेतन बुद्धि के प्रति सम्वेदी पुरूष अर्थात जीव का उसके वास्तव विशुद्ध चैतन्य रूप में बोध होता है और इस बोध के प्रयास में होने वाले विघ्नों का निराकरण होता है- 'ततः प्रत्यक्चेतनाभिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ।। " (१/२६ योग सूत्र) । मीमांस दर्शन
आस्तिक दर्शनों की श्रेणी में मीमांसा दर्शन का महत्वपूर्ण स्थान है। इस दर्शन के मुख्य प्रणेता महर्षि 'जैमिनी' माने जाते हैं । 'मीमांसा' शब्द का अर्थ है- 'पूजित विचार'। यह शब्द पहले कर्मकाण्ड विषयक जिज्ञासा के लिये प्रयुक्त होता था । अर्थात् 'मीमांसा' का अर्थ है- किसी वस्तु के स्वरूप का यथार्थ वर्णन । मीमांसा दर्शन का उद्देश्य है- ब्राह्मणों के कर्मकाण्डों और यज्ञों आदि का प्रणालीबद्ध विवेचन प्रस्तुत करना । वेद के दो भाग हैं- १. कर्मकाण्ड, २. ज्ञानकाण्ड ।
कर्मकाण्ड के अन्तर्गत यज्ञ-यागादि की विधि तथा अनुष्ठान का वर्णन कर्मकाण्ड का विषय है। ज्ञानकाण्ड के अन्तर्गत जीव-जगत - ईश्वर के परस्पर सम्बन्ध का वर्णन किया जाता है। मीमांसा दो प्रकार की है- १. कर्ममीमांसा, २. ज्ञान मीमांसा ।
कर्ममीमांसा
कर्म विषयक ज्ञानों का परिहार करती है । और ज्ञान मीमांसा ज्ञान विषयक बातों का परिहार करती है। कर्ममीमांसा को पूर्वमीमांसा या मीमांसा भी कहते हैं। ज्ञान मीमांसा को उत्तर मीमांसा या वेदान्त कहते हैं । वेदान्त वेद के उत्तर भाग अर्थात उपनिषद भाग या ज्ञानकाण्ड पर आधारित है इसलिये इस उत्तर मीमांसा, ब्रह्ममीमांसा
2 यो० सू० १/२५ ।
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